नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (AAP) के 14 साल के इतिहास में 24 अप्रैल 2026 की तारीख किसी काले अध्याय की तरह दर्ज हो गई है। राज्यसभा में ‘आप’ के 7 दिग्गजों ने जिस तरह एक साथ पाला बदला, उसने न केवल अरविंद केजरीवाल को हैरान कर दिया, बल्कि पार्टी के अस्तित्व पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब इस महा-बगावत के पीछे की वो कहानी सामने आ रही है, जो बताती है कि केजरीवाल ने डैमेज कंट्रोल की आखिरी कोशिश भी की थी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
केजरीवाल का वो ‘वादा’ जो अधूरा रह गया
सूत्रों के मुताबिक, अरविंद केजरीवाल को सांसदों की नाराजगी की भनक लग गई थी। शुक्रवार शाम को उन्होंने सभी बागी सांसदों को अपने आवास पर ‘चाय पर चर्चा’ के लिए बुलाया था। खबर है कि केजरीवाल ने इन नेताओं को एक बड़ा ऑफर दिया था। उन्होंने आश्वासन दिया था कि यदि वे फिलहाल पार्टी के कामकाज से खुश नहीं हैं, तो वे अपनी मर्जी से इस्तीफा दे दें और पार्टी उन्हें अगले कार्यकाल में फिर से राज्यसभा भेजने का लिखित वादा करेगी। केजरीवाल की कोशिश थी कि सांसदों को ‘भविष्य’ का लालच देकर फिलहाल बगावत को टाला जाए, लेकिन बागी सांसदों ने मिलने के बजाय सीधे भाजपा मुख्यालय जाने का फैसला किया।
क्यों नहीं हुई मुलाकात? गुरुवार सुबह ही लिखी गई थी स्क्रिप्ट
बताया जा रहा है कि राघव चड्ढा के नेतृत्व में सांसदों ने गुरुवार सुबह ही पार्टी छोड़ने का मन बना लिया था। मुलाकात न होने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि सांसदों को अब केजरीवाल के वादों पर भरोसा नहीं रहा था। चड्ढा, जो कभी केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद थे, उन्हें राज्यसभा में उप-नेता पद से हटाकर अशोक मित्तल को कमान सौंपना ‘आग में घी’ का काम कर गया। चड्ढा ने इसे अपना अपमान माना और तुरंत अन्य नाराज सांसदों जैसे संदीप पाठक और स्वाति मालीवाल को एकजुट करना शुरू कर दिया। जब तक केजरीवाल का बुलावा पहुंचा, तब तक राघव चड्ढा की टीम भाजपा के साथ अपनी डील फाइनल कर चुकी थी।
इन 7 चेहरों ने हिला दी केजरीवाल की सत्ता
पार्टी छोड़ने वालों में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि नामी हस्तियां भी शामिल हैं। राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल ने एक साथ ‘झाड़ू’ छोड़ दी है। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो टूक कहा, “हम गलत पार्टी में सही लोग थे। AAP अब भ्रष्टाचार विरोधी सिद्धांतों से पूरी तरह भटक गई है।” रोचक बात यह है कि जिस अशोक मित्तल को चड्ढा की जगह पद दिया गया था, वे भी चड्ढा के साथ ही भाजपा में चले गए।
दो-तिहाई बहुमत और ‘ऑपरेशन लोटस’ की जंग
संवैधानिक रूप से यह टूट बहुत सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। राघव चड्ढा ने दावा किया है कि चूंकि 10 में से 7 सांसद (दो-तिहाई) एक साथ अलग हुए हैं, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा। भाजपा ने इसे ‘लोकतंत्र की जीत’ बताया है, वहीं आम आदमी पार्टी इसे ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दे रही है। AAP नेताओं का आरोप है कि पंजाब सरकार को अस्थिर करने के लिए भाजपा ने करोड़ों रुपये और जांच एजेंसियों के डर का इस्तेमाल किया है।
पार्टी के स्तंभ ही बने सबसे बड़ी चुनौती
संदीप पाठक, जो संगठन के ‘चाणक्य’ थे और राघव चड्ढा, जो पार्टी का ‘ग्लैमरस चेहरा’ थे, उनके जाने से AAP के पास अब केवल 3 राज्यसभा सांसद बचे हैं। 2027 के पंजाब चुनाव से पहले यह बगावत पार्टी के संगठन को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर सकती है। केजरीवाल के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती अपने बचे हुए विधायकों और सांसदों को एकजुट रखने की है।
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