
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी और उनके करीबियों की कानूनी मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। राज्य के चर्चित साल्बोनी जमीन हड़पने (Salboni Land-Grabbing Case) से जुड़े कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के मामले में अब पश्चिम बंगाल सरकार ने अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक (PA) सुमित रॉय पर कानूनी शिकंजा कस दिया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए सुमित रॉय को हिरासत में लेकर पूछताछ (Custodial Interrogation) करने की अनुमति मांगी है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पुलिस द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई जांच रिपोर्ट का अवलोकन करने तक रॉय की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक की अवधि को बढ़ा दिया है।
‘जांच में सहयोग नहीं कर रहे रॉय’: सॉलिसिटर जनरल ने मांगी कस्टडी
सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष राज्य सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता पेश हुए।
सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट के सामने दलील रखी कि सुमित रॉय को दी गई गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह मामला बहुत बड़ा है और अब तक सामने आई चीजें केवल ‘आइसबर्ग की नोक’ (Tip of the iceberg) हैं। रॉय हर दिन जांच के लिए उपस्थित तो हो रहे हैं, लेकिन वे पुलिस के सवालों के जवाब देने से बच रहे हैं और असहयोग कर रहे हैं। इस बहु-करोड़ सरकारी जमीन घोटाले की तह तक जाने के लिए उनसे हिरासत में पूछताछ किया जाना अनिवार्य है।” सरकार की ओर से केस डायरी और अब तक जुटाए गए साक्ष्यों का विवरण सीलबंद लिफाफे में पीठ को सौंपा गया। इस कानूनी घटनाक्रम की पूरी रिपोर्ट लाइव हिन्दुस्तान की विशेष रिपोर्ट में भी प्रमुखता से प्रकाशित की गई है।
‘चुप रहने का अधिकार बनाम एजेंसी का गिरफ्तारी का अधिकार’: कोर्ट में तीखी बहस
सुमित रॉय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कस्टडी की मांग का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल अदालत के पूर्व निर्देशों के अनुसार सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक नियमित रूप से जांच एजेंसी के सामने पेश हो रहे हैं।
शंकरनारायणन ने संविधान के अनुच्छेद 20(3) का हवाला देते हुए दलील दी, “संविधान हर नागरिक को ‘चुप रहने का अधिकार’ (Right to Silence) देता है। किसी सवाल का जवाब न देना जांच में असहयोग नहीं माना जा सकता।”
इस दलील पर पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“संविधान नागरिक के चुप रहने के अधिकार की रक्षा करता है, लेकिन वही संविधान निष्पक्ष जांच के लिए जांच एजेंसी के गिरफ्तारी के अधिकार को भी सुरक्षित करता है।”
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि जिस कथित घटना की बात की जा रही है वह 5 साल पुरानी है और एफआईआर में सुमित रॉय का नाम तक नहीं था। उन्हें केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक हैं।
क्या है साल्बोनी जमीन हड़पने का पूरा मामला?
यह पूरा विवाद पश्चिम बंगाल के साल्बोनी इलाके में सरकारी और अधिग्रहित जमीनों के फर्जी दस्तावेजों के जरिए अवैध हस्तांतरण से जुड़ा हुआ है।
-
दर्ज धाराएं: पुलिस ने इस मामले में आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust), धोखाधड़ी (Cheating), दस्तावेजों की जालसाजी (Forgery) और आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) जैसी गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया है।
-
हाई कोर्ट से झटका: इससे पहले 3 अगस्त को कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुमित रॉय की अग्रिम जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामले में कई प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत के साक्ष्य सामने आ रहे हैं।
-
सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत: हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ रॉय ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, जहां 6 अगस्त को शीर्ष अदालत ने कुछ शर्तों के साथ उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाई थी।
सीलबंद लिफाफे की रिपोर्ट देखने के बाद होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सॉलिसिटर जनरल द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई जांच सामग्री और प्रोग्रेस रिपोर्ट का गहराई से अध्ययन करने के बाद ही कस्टोडियल इंटेरोगेशन की अर्जी पर फैसला सुनाया जाएगा। तब तक के लिए सुमित रॉय को मिली गिरफ्तारी से सुरक्षा की मियाद को अगले आदेश तक बढ़ा दिया गया है।
अभिषेक बनर्जी के निजी सहायक पर राज्य सरकार के इस कड़े रुख ने पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में एक बार फिर राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया