
अभिनेता से राजनेता और फिर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर तय करने वाले थलपति विजय की मुश्किलें केवल राजनीतिक गलियारों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अब उनकी फिल्मी दुनिया पर भी इसका सीधा और गहरा असर दिखने लगा है। तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों पुराने कावेरी नदी जल विवाद और हाल ही में मेकेदातू बांध परियोजना को लेकर गरमाई सियासत की आंच अब कर्नाटक के सिनेमाघरों तक पहुंच गई है। पिछले हफ्ते ही सिनेमाघरों में रिलीज हुई थलपति विजय की बहुचर्चित फिल्म ‘जन नायकन’ को कर्नाटक के कई हिस्सों में कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसके चलते कई थियेटर मालिकों ने सुरक्षा और तनाव के माहौल को देखते हुए फिल्म की स्क्रीनिंग को बीच में ही रोक दिया है या पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
कन्नड़ समूहों का प्रदर्शन और थियेटर्स के बाहर पोस्टर्स फाड़े जाने का मामला
कन्नड़ मीडिया रिपोर्ट्स और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, मेकेदातू बांध परियोजना के मसले पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री थलपति विजय के हालिया राजनीतिक रुख से कर्नाटक के कई स्थानीय संगठन और कन्नड़ समूह बेहद खफा हैं। इसी नाराजगी का सीधा असर उनकी फिल्म ‘जन नायकन’ पर देखने को मिल रहा है। कर्नाटक के विभिन्न इलाकों में प्रदर्शनकारियों ने सिनेमाघरों के बाहर जमकर हंगामा किया और थियेटर्स के बाहर लगे थलपति विजय की फिल्म के पोस्टर्स को फाड़ दिया। स्थिति को बिगड़ता देख और किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना या तोड़फोड़ से बचने के लिए थियेटर मालिकों ने स्वेच्छा से तथा भारी दबाव के चलते फिल्म की स्क्रीनिंग को रोक दिया। गौर करने वाली बात यह है कि 23 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हुई इस फिल्म को कर्नाटकभर में करीब 150 से अधिक स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था, लेकिन कावेरी विवाद के तूल पकड़ते ही इसका व्यावसायिक और सिनेमाई गणित गड़बड़ा गया है।
बेंगलुरु के ‘उर्वशी थिएटर’ में पुलिस की एडवायजरी और ‘कारावली’ फिल्म की एंट्री
इस विरोध प्रदर्शन का सबसे बड़ा केंद्र राजधानी बेंगलुरु का मशहूर ‘उर्वशी थिएटर’ बना, जहां थलपति विजय की फिल्म ‘जन नायकन’ का प्रदर्शन चल रहा था। कन्नड़ समर्थक समूहों के भारी विरोध और संभावित हिंसा के खतरे को भांपते हुए स्थानीय पुलिस प्रशासन ने तुरंत सख्त कदम उठाया और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक विशेष एडवायजरी जारी की। पुलिस की चेतावनी और एहतियाती उपायों के बाद उर्वशी थिएटर प्रबंधन ने बड़ा फैसला लेते हुए विजय की फिल्म की स्क्रीनिंग को तुरंत रद्द कर दिया और उसकी जगह लोकप्रिय कन्नड़ फिल्म ‘कारावली’ का प्रसारण शुरू कर दिया। इसके बावजूद पुलिस प्रशासन ने किसी भी अनहोनी से निपटने के लिए थिएटर के बाहर भारी पुलिस बल और सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर दिया है, ताकि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में रहे।
मंड्या में भी विरोध की आग, राजनीतिक और सिनेमाई समीकरणों पर पड़ रहा असर
बेंगलुरु ही नहीं, बल्कि कावेरी बेसिन के संवेदनशील माने जाने वाले इलाके मंड्या में भी ‘जन नायकन’ को लेकर तीव्र आक्रोश देखने को मिला है। मंड्या में उग्र समूहों ने सड़कों पर उतरकर विजय के खिलाफ नारेबाजी की, उनके कटआउट्स व पोस्टर्स को तहस-नहस किया और फिल्म की स्क्रीनिंग पूरी तरह ठप करवा दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि थलपति विजय के लिए मुख्यमंत्री बनने के बाद यह एक दोहरी चुनौती है—एक तरफ जहां उन्हें तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक लड़ाइयां लड़नी पड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी फिल्मों को पड़ोसी राज्य में इस राजनीतिक द्वंद्व का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। जैसे-जैसे कावेरी जल विवाद और मेकेदातू बांध पर बयानबाजी तेज होगी, वैसे-वैसे कर्नाटक में तमिल फिल्मों और कलाकारों के खिलाफ स्थानीय संगठनों का रुख और अधिक कड़ा हो सकता है, जिससे फिल्म निर्माताओं और वितरकों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
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