इस्लामाबाद/बीजिंग : मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच पाकिस्तान एक बार फिर अमेरिका और ईरान को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिशों में जुट गया है। इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की ऐतिहासिक वार्ता के बाद, अब दूसरे दौर की मध्यस्थता की तैयारियां तेज हो गई हैं। हालांकि शनिवार को हुई 21 घंटे की लंबी बातचीत में कोई स्थायी समझौता नहीं हो सका, लेकिन राजनयिक गलियारों में इसे एक सकारात्मक शुरुआत माना जा रहा है।
ट्रंप और वेंस की मंशा: क्या डील के करीब है अमेरिका?
अमेरिकी प्रशासन की ओर से आ रहे बयान संकेत दे रहे हैं कि वाशिंगटन इस संघर्ष को कूटनीतिक तरीके से सुलझाने का इच्छुक है:
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डोनाल्ड ट्रंप: राष्ट्रपति ट्रंप ने सोमवार को पुष्टि की कि उन्हें “दूसरे पक्ष” (ईरान) से बुलावा आया है और वे डील करने के लिए उत्सुक हैं।
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जेडी वेंस: अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने भी स्वीकार किया कि ईरान के साथ समझौते की बातचीत कुछ कदम आगे बढ़ी है।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बयान
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने संसद भवन के बाहर मीडिया से कहा कि 1979 की क्रांति के बाद यह पहली बार था जब दोनों देशों के शीर्ष अधिकारी आमने-सामने बैठे। उन्होंने कहा:
“वार्ता के बाद यह संतोषजनक है कि अब तक कोई नकारात्मक घटनाक्रम नहीं हुआ है। राजनयिक प्रयास रचनात्मक दिशा में बढ़ रहे हैं और जल्द ही अगले दौर की वार्ता की उम्मीद है।”
चीन का समर्थन और ‘सर्वोच्च प्राथमिकता’
इस पूरे घटनाक्रम में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार से फोन पर लंबी चर्चा की। वांग यी ने स्पष्ट किया कि:
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युद्धविराम: पश्चिम एशिया में संघर्ष को दोबारा भड़कने से रोकना और युद्धविराम (Ceasefire) बनाए रखना इस समय दुनिया की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
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चीनी समर्थन: चीन ने क्षेत्र में शांति बहाली के लिए पाकिस्तान की “रचनात्मक कूटनीतिक भूमिका” की सराहना की और अपना पूरा समर्थन देने का वादा किया।
आर्थिक संकट के बीच मध्यस्थता
एक तरफ पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी घरेलू आर्थिक स्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, जिस होटल में अमेरिका-ईरान की हाई-प्रोफाइल वार्ता आयोजित की गई, पाकिस्तान सरकार उसका बिल चुकाने में भी कठिनाइयों का सामना कर रही है।
चिंता का विषय: भारत पर प्रभाव
यूएन की एक हालिया रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसके आर्थिक परिणामों के चलते भारत में गरीबों की संख्या में 25 लाख तक का इजाफा हो सकता है, क्योंकि तेल की कीमतें और वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होगी।
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