बांग्लादेश में ISI की नई साजिश? ढाका की खुफिया टीम पहुंची पाकिस्तान, भारत की पूर्वी सीमा पर मंडराया सुरक्षा संकट

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक और सुरक्षा समीकरणों में अचानक आई तेजी ने कूटनीतिक गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से ढाका और इस्लामाबाद के बीच सैन्य व खुफिया स्तर पर लगातार गहराते रिश्ते अब खुलकर सामने आने लगे हैं। हाल ही में बांग्लादेश की सैन्य खुफिया एजेंसी डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) का एक छह सदस्यीय उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के गुप्त दौरे पर पहुंचा है। इस दल ने पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) और पाकिस्तानी सेना के शीर्ष अधिकारियों के साथ गोपनीय बैठकें की हैं।

भारत की पूर्वी सीमा के मुहाने पर पाकिस्तान और आईएसआई की यह नई सक्रियता नई दिल्ली की राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए गंभीर चिंता का सबब बन गई है।

DGFI का गुप्त मिशन: कर्नल मगफूज-उल-बारी के नेतृत्व में इस्लामाबाद दौरा

बांग्लादेशी खुफिया एजेंसी DGFI का यह 6 सदस्यीय दल 15 अगस्त को ढाका के हजरत शाह जलाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से बैंकॉक होते हुए पाकिस्तान पहुंचा। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर्नल मगफूज-उल-बारी कर रहे हैं, जिसमें वायुसेना और रक्षा विंग के कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं।

यह कोई पहला मौका नहीं है जब दोनों देशों के खुफिया प्रमुखों के बीच मुलाकात हुई हो। इससे पहले DGFI के महानिदेशक मेजर जनरल कैसर रशीद चौधरी ने भी इस्लामाबाद की यात्रा की थी और पाकिस्तानी सेना व आईएसआई के अधिकारियों के साथ गहन चर्चा की थी। इसके अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश के वायु सेना प्रमुखों के बीच पाकिस्तान निर्मित ‘JF-17 थंडर’ लड़ाकू विमानों की खरीद-बिक्री और रक्षा सहयोग को लेकर भी बातचीत हो चुकी है। पाकिस्तान खुद को बांग्लादेश के मुख्य हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में स्थापित करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है।

हसीना सरकार के बाद ISI को मिली खुली छूट

शेख हसीना के 15 साल के कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश की धरती से भारत विरोधी गतिविधियों, आतंकी नेटवर्क और पाकिस्तानी आईएसआई के ठिकानों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया था। भारत और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा और सीमा प्रबंधन का तालमेल ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच चुका था।

हालांकि, हसीना सरकार के हटने के बाद बनी अंतरिम व्यवस्था और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में पाकिस्तान को बांग्लादेश के सुरक्षा तंत्र में दोबारा घुसपैठ करने का खुला मौका मिल गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आईएसआई एक बार फिर बांग्लादेश को अपनी पूर्वोत्तर विरोधी और भारत विरोधी साजिशों के लॉन्चपैड के रूप में इस्तेमाल करने की फिराक में है, जो 1990 और 2000 के दशक में देखने को मिलता था।

क्या भारत पर दबाव बनाने की है रणनीतिक चाल?

पूर्व भारतीय राजनयिकों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि बांग्लादेश की मौजूदा सरकार पाकिस्तान और चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाकर भारत के खिलाफ एक ‘रणनीतिक लीवर’ (सौदा करने की ताकत) हासिल करने का प्रयास कर रही है।

एक तरफ बांग्लादेश भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं और यात्राओं को लेकर नई शर्तें और बहाने बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ सुरक्षा समझौते किए जा रहे हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों का कहना है कि भारत और बांग्लादेश के बीच 4,000 किलोमीटर से ज्यादा लंबी साझी सीमा, नदी जल बंटवारा और गहरा आर्थिक व व्यापारिक निर्भरता का रिश्ता है। ऐसे में ढाका के लिए पूरी तरह भारत-विरोधी खेमे में जाना व्यावहारिक रूप से मुमकिन नहीं होगा, लेकिन यह दबाव की नीति नई दिल्ली को सतर्क रहने पर मजबूर कर रही है।

भारत की सतर्कता और सुरक्षा एजेंसियों की पैनी नजर

भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने पहले ही स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश के साथ आपसी हितों, समानता और पारस्परिकता पर आधारित सकारात्मक संबंध बनाए रखना चाहता है। लेकिन भारत की ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) और पूर्वोत्तर राज्यों से सटी संवेदनशील सीमा के पास पाकिस्तानी खुफिया अधिकारियों की गतिविधियां बढ़ने से भारतीय खुफिया एजेंसियां (RAW व IB) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) पूरी तरह अलर्ट मोड पर हैं। भारत इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए है ताकि किसी भी सुरक्षा खतरे को समय रहते विफल किया जा सके।

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