वेलिंगटन: भारत और न्यूजीलैंड के बीच होने जा रहे ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर ग्रहण लगता नजर आ रहा है। न्यूजीलैंड की गठबंधन सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री शेन जोन्स ने इस प्रस्तावित डील को लेकर बेहद आपत्तिजनक और नस्लीय टिप्पणी की है। उन्होंने भारत के साथ इस समझौते की तुलना ‘बटर चिकन सुनामी’ से कर दी है। मंत्री के इस बयान के बाद न केवल न्यूजीलैंड की राजनीति में भूचाल आ गया है, बल्कि वहां रहने वाले भारतीय समुदाय में भी भारी आक्रोश है।
क्या है ‘बटर चिकन सुनामी’ विवाद?
न्यूजीलैंड की सत्ताधारी गठबंधन सरकार में शामिल ‘न्यूजीलैंड फर्स्ट’ (NZ First) पार्टी के उपनेता और क्षेत्रीय विकास मंत्री शेन जोन्स ने एक रेडियो इंटरव्यू के दौरान मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दीं। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस समझौते को कभी स्वीकार नहीं करेगी। जोन्स ने भड़काऊ लहजे में कहा, “मुझे परवाह नहीं है कि हमारी कितनी आलोचना होती है, लेकिन मैं न्यूजीलैंड में आने वाली ‘बटर चिकन सुनामी’ से कभी सहमत नहीं होने वाला।” दरअसल, यहां ‘बटर चिकन’ शब्द का इस्तेमाल भारतीयों और उनकी संस्कृति को निशाना बनाने के लिए एक स्टीरियोटाइप के रूप में किया गया है।
ट्रेड डील से आखिर क्यों डरी सहयोगी पार्टी?
प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन की सरकार अगले सप्ताह नई दिल्ली में इस ‘पीढ़ी में एक बार होने वाले’ समझौते पर हस्ताक्षर करने वाली है। लेकिन दक्षिणपंथी पार्टी ‘NZ First’ ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उनकी नाराजगी के दो मुख्य कारण हैं:
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प्रवासियों का डर: पार्टी को आशंका है कि इस डील के बाद न्यूजीलैंड के दरवाजे हजारों भारतीयों के लिए खुल जाएंगे। अनुमान है कि करीब 20,000 भारतीय प्रवासी न्यूजीलैंड आ सकते हैं।
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भारी निवेश का दबाव: इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड को अगले 15 वर्षों में भारत में लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर (34 बिलियन न्यूजीलैंड डॉलर) का भारी-भरकम निवेश करना होगा।
नस्लवाद के आरोपों से घिरे मंत्री, चौतरफा निंदा
मंत्री शेन जोन्स के इस बयान को सीधे तौर पर नस्लभेदी माना जा रहा है। ऑकलैंड इंडियन एसोसिएशन की अध्यक्ष शांति पटेल ने इसे भारतीय समुदाय के लिए अपमानजनक बताया है। वहीं, विपक्षी लेबर पार्टी की भारतीय मूल की सांसद प्रियंका राधाकृष्णन ने इसे ‘सरासर नस्लवाद’ करार देते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में बैठे राजनेताओं को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती।
पीएम लक्सन के सामने बढ़ा राजनीतिक संकट
प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने अपने ही मंत्री के बयान को ‘गैर-मददगार’ बताते हुए उससे किनारा कर लिया है। हालांकि, सहयोगी पार्टी के हटने से सरकार अल्पमत के खतरे में आ सकती है। अब इस कानून को संसद में पास कराने के लिए सरकार को मुख्य विपक्षी दल ‘लेबर पार्टी’ की मदद लेनी पड़ सकती है। लेबर पार्टी ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं, क्योंकि वे भी भारत में होने वाले इतने बड़े निवेश की शर्तों को लेकर सशंकित हैं।
भारत-न्यूजीलैंड संबंधों पर असर
यह समझौता न्यूजीलैंड के व्यापारिक भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इसके जरिए उन्हें दुनिया के सबसे बड़े बाजार (भारत) तक सीधी पहुंच मिलेगी। लेकिन घरेलू राजनीति और नस्लीय टिप्पणियों ने इस सुनहरे अवसर पर विवाद की कालिख पोत दी है। अब देखना यह होगा कि भारत सरकार इस अपमानजनक टिप्पणी पर क्या कड़ा रुख अपनाती है।
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