पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी हलचल मची है जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता तक को चौंका दिया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित करने की दहलीज पर हैं, जिसे अब तक बिहार के इतिहास में केवल राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ही छू सके हैं। नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का फैसला कर न केवल अपने विरोधियों को हैरान कर दिया है, बल्कि वे एक ऐसे ‘क्लब’ में शामिल होने जा रहे हैं जहाँ वे लालू यादव के बाद दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री होंगे जिन्होंने संसदीय और विधायी राजनीति के चारों सदनों का सफर तय किया है।
‘चारों सदनों’ का सफर: लालू के बाद नीतीश का नंबर
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, नीतीश कुमार बिहार के दूसरे ऐसे नेता बनने जा रहे हैं जो बिहार विधानसभा, बिहार विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा—इन चारों सदनों के सदस्य रह चुके होंगे। लालू प्रसाद यादव अब तक इकलौते ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जिनके नाम यह दुर्लभ रिकॉर्ड दर्ज था। नीतीश कुमार ने हाल ही में सोशल मीडिया के जरिए अपनी इस दिली इच्छा का इजहार किया था कि वे अपने राजनीतिक जीवन में चारों सदनों का अनुभव लेना चाहते हैं। अब राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के साथ ही उनका यह सपना हकीकत में बदलने जा रहा है।
20 साल का राज और 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ
नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर किसी चमत्कार से कम नहीं है। 2005 से बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे नीतीश ने हाल ही में रिकॉर्ड 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर देश में एक नया मानक स्थापित किया था। बीच में जीतन राम मांझी के 9 महीने के कार्यकाल को छोड़ दें, तो पिछले दो दशकों से बिहार की बागडोर उन्हीं के हाथों में रही है। अब उनके राज्यसभा जाने के फैसले को बिहार में ‘एक युग के अंत’ और ‘नए युग की शुरुआत’ के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उनके दिल्ली जाने के बाद बिहार में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने का रास्ता भी साफ हो सकता है।
गठबंधन की बिसात और भविष्य की रणनीति
नीतीश कुमार को राजनीति का ‘चाणक्य’ कहा जाता है। उन्होंने समय-समय पर गठबंधन बदले, लेकिन अपनी कुर्सी और प्रासंगिकता को हमेशा बरकरार रखा। लालू यादव के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता और कभी-कभी की दोस्ती ने बिहार की दिशा तय की है। अब जबकि वे राज्यसभा जा रहे हैं, सवाल उठ रहा है कि उनके बाद जदयू (JDU) की कमान कौन संभालेगा और क्या पार्टी उनकी विरासत को संभाल पाएगी? विपक्षी खेमे में इस कदम को लेकर कयासबाजी तेज है, लेकिन नीतीश का यह रिकॉर्ड उनकी लंबी और सफल राजनीतिक पारी पर एक सुनहरी मुहर की तरह है।
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