इस्लामाबाद। अमेरिका और ईरान के बीच हुए 14 दिनों के युद्धविराम (Ceasefire) का श्रेय लेने की होड़ में पाकिस्तान अब एक कदम और आगे निकल गया है। पाकिस्तान की मीडिया और व्यापारिक संगठनों ने अब प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ देने की मांग उठा दी है। इस मांग के सामने आते ही सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई है और लोग इसे पाकिस्तान की “कॉपी-पेस्ट कूटनीति” का अगला अध्याय बता रहे हैं।
किसने की यह अजीबोगरीब मांग?
पाकिस्तान में इस समय नोबेल पुरस्कार की चर्चा जोरों पर है:
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KCCI का बयान: कराची चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCCI) ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि यह सीजफायर केवल शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर के अथक प्रयासों से संभव हुआ है, इसलिए वे इस सर्वोच्च सम्मान के हकदार हैं।
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मीडिया और लेख: पाकिस्तानी अखबार ‘द नेशन’ में रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल सैयद अहमद नदीम कादरी ने एक लेख लिखकर तर्क दिया कि पाकिस्तान ने एक वैश्विक महायुद्ध को टाल दिया है और ऊर्जा बाजारों को स्थिर किया है, जो नोबेल की मूल भावना के अनुरूप है।
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ख्वाजा आसिफ का दावा: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा कि अब दुनिया पाकिस्तान को एक “भरोसेमंद मध्यस्थ” के रूप में देख रही है।
क्रेडिट की जंग: क्या है असली हकीकत?
भले ही पाकिस्तान नोबेल के सपने देख रहा हो, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इस “मध्यस्थता” की पोल खोल दी है:
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अमेरिका की ‘कठपुतली’?: हाल ही में शहबाज शरीफ का ‘Draft’ वाला ट्वीट वायरल हुआ था, जिससे साफ हो गया कि ट्वीट की स्क्रिप्ट वाइट हाउस ने लिखी थी। विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान केवल अमेरिका के संदेशवाहक (Messenger) की भूमिका निभा रहा था।
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चीन का असली प्रभाव: खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया है कि ईरान को टेबल पर लाने में चीन की भूमिका सबसे अहम रही। बीजिंग ने अपने आर्थिक प्रभाव का इस्तेमाल कर तेहरान पर दबाव बनाया कि वह सीजफायर स्वीकार करे।
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सिर्फ ‘पोस्ट ऑफिस’ की भूमिका: कई विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान इस पूरे मामले में एक “पोस्ट ऑफिस” की तरह था, जिसने केवल वाशिंगटन की चिट्ठी तेहरान तक पहुंचाई।
सोशल मीडिया पर ‘फजीहत’ की लहर
पाकिस्तानी मीडिया में नोबेल की मांग उठते ही यूजर्स ने तीखे तंज कसे हैं:
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एक यूजर ने लिखा, “पहले ‘Draft’ हटाना तो सीख लो, फिर नोबेल मांगना।” * दूसरे ने तंज कसा, “नोबेल शांति पुरस्कार है, ‘कॉपी-पेस्ट’ का अवार्ड नहीं।”
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भारतीय सोशल मीडिया पर भी यह खबर चर्चा में है, जहां लोग कह रहे हैं कि जिसे अपना घर संभालना नहीं आता, वह दुनिया की शांति का ठेका ले रहा है।
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