उमर अब्दुल्ला और पायल का 17 साल पुराना वैवाहिक विवाद खत्म: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर दी तलाक को मंजूरी, आपसी सहमति से सभी केस वापस

जम्मू-कश्मीर की राजनीति के केंद्र में रहने वाले मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़ा एक बड़ा और अहम कानूनी अध्याय आखिरकार समाप्त हो गया है। देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने उमर अब्दुल्ला और उनकी पत्नी पायल अब्दुल्ला के बीच लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए दोनों के तलाक को आधिकारिक रूप से मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही लगभग 17 वर्षों से एक-दूसरे से अलग रह रहे इस हाई-प्रोफाइल जोड़े के बीच का कानूनी संघर्ष हमेशा के लिए खत्म हो गया है, क्योंकि दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक और दीवानी मामलों को वापस लेने का भी ऐतिहासिक फैसला किया है।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ‘डेड मैरिज’ मानकर अनुच्छेद 142 के तहत दी गई मंजूरी

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को अवगत कराया कि दोनों पक्षों ने अब अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने और पूरी तरह से कानूनी आज़ादी का रास्ता चुनने का मन बना लिया है। इसके बाद न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस मामले का पूर्ण और अंतिम रूप से निपटारा कर दिया। अदालत ने पहले ही सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी कि चूंकि दोनों पति-पत्नी पिछले करीब 16-17 वर्षों से पूरी तरह अलग रह रहे हैं और उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है, इसलिए इस रिश्ते को कानूनी तौर पर ‘डेड मैरिज’ (Dead Marriage) माना जाना चाहिए। सर्वोच्च अदालत के इस हस्तक्षेप के बाद लंबे समय से चली आ रही कानूनी खींचतान का अंत हो गया है और दोनों पक्षों ने आपसी रजामंदी से अपने रास्ते अलग कर लिए हैं।

साल 1994 में हुई थी शादी, फिर मतभेदों के चलते 2009 से अलग रहने लगे थे उमर-पायल

उमर अब्दुल्ला और पायल की प्रेम कहानी और शादी की शुरुआत काफी चर्चा में रही थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों की पहली मुलाकात नई दिल्ली के मशहूर ओबेरॉय होटल में काम करने के दौरान हुई थी, जहां पेशेवर मेल-जोल धीरे-धीरे गहरे रिश्ते में बदल गया और सितंबर 1994 में दोनों ने पारंपरिक रूप से विवाह कर लिया था। इस शादी से उनके दो बेटे भी हैं, जो उनके जीवन का अहम हिस्सा रहे हैं। हालांकि, वक्त के साथ दोनों के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई और आपसी मतभेदों के चलते वे साल 2009 से एक-दूसरे से अलग रहने लगे। इसके बाद साल 2011 में उमर अब्दुल्ला ने सार्वजनिक रूप से अपने अलग होने की घोषणा कर दी थी, जिसके बाद से ही उनके निजी जीवन को लेकर अटकलों और कानूनी लड़ाइयों का दौर शुरू हो गया था, जो अब जाकर सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम फैसले पर थमा है।

निचली अदालत से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक चली लंबी लड़ाई और गुजारा भत्ता का विवाद

इस तलाक तक पहुंचने का सफर उमर अब्दुल्ला के लिए कानूनी मोर्चे पर बेहद संघर्षपूर्ण रहा है। शुरुआत में उमर अब्दुल्ला ने फैमिली कोर्ट में क्रूरता (Cruelty) के आधार पर अपनी पत्नी से तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसे फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वे क्रूरता के आरोपों को कानूनी रूप से साबित करने में असफल रहे हैं। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन दिसंबर 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए उनकी तलाक की याचिका को खारिज कर दिया था। उस दौरान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उमर अब्दुल्ला को निर्देश दिया था कि वे अपनी पत्नी पायल को हर महीने 1.5 लाख रुपये और अपने बेटे की शिक्षा व पालन-पोषण के लिए 60,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता प्रदान करें। हाईकोर्ट के इस कड़े रुख के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां अब जाकर दोनों पक्षों की सहमति और अदालत के हस्तक्षेप से इस बहुचर्चित वैवाहिक विवाद का हमेशा के लिए समापन हो गया है।

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