यरुशलम/तेहरान: पश्चिम एशिया में महीनों से जारी बारूदी संघर्ष अब भले ही शांत पड़ता दिख रहा हो, लेकिन इस युद्ध के नतीजों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। इजरायल के पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (Vice NSA) चक फ्रैलिइच ने एक विस्फोटक इंटरव्यू में ट्रंप और नेतन्याहू प्रशासन के दावों की हवा निकाल दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका और सैन्य रूप से उन्नत इजरायल, ईरान के खिलाफ अपने मुख्य उद्देश्यों को पाने में नाकाम रहे हैं।
सैन्य जीत लेकिन राजनीतिक हार: क्यों पिछड़ गए ट्रंप और नेतन्याहू?
चक फ्रैलिइच ने फर्स्टपोस्ट को दिए इंटरव्यू में बताया कि अमेरिका और इजरायल ने भले ही ईरान के सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचाया हो, लेकिन वे अपने रणनीतिक लक्ष्यों से कोसों दूर रह गए। अमेरिका का पहला बड़ा लक्ष्य ईरान में ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) करना था, जिसमें वह पूरी तरह विफल रहा। वहीं, दूसरा लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को जड़ से मिटाना था, जो आज भी काफी हद तक सुरक्षित है। फ्रैलिइच के अनुसार, यह अभियान सैन्य रूप से सफल दिखने के बावजूद राजनीतिक मोर्चे पर एक बड़ी नाकामी है।
ईरान की ‘होर्मुज रणनीति’ ने पलटी बाजी
28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला बोला था, तब दुनिया को लगा था कि ईरान घुटने टेक देगा। लेकिन पांच हफ्तों तक चले भीषण संघर्ष में ईरान न केवल डटा रहा, बल्कि उसने अपनी भौगोलिक स्थिति का बखूबी इस्तेमाल किया। फ्रैलिइच ने खुलासा किया कि ईरान द्वारा ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को बंद करने की धमकी ने अमेरिका जैसी महाशक्ति को बैकफुट पर ला दिया। वैश्विक अर्थव्यवस्था के डूबने के डर ने ट्रंप प्रशासन को अपने लक्ष्य बदलने और बिना किसी ठोस समाधान के युद्ध विराम की ओर बढ़ने पर मजबूर कर दिया।
अविश्वास की खाई: क्यों नहीं हो पा रहा शांति समझौता?
शांति वार्ताओं के लटकने का सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच गहराता ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ है। पूर्व NSA का मानना है कि 2018 में जब ट्रंप ने परमाणु समझौते को रद्द किया था, तभी से अविश्वास की नींव पड़ गई थी, जो उनके दूसरे कार्यकाल में और गहरी हो गई है। आज स्थिति यह है कि अमेरिका ईरान के यूरेनियम भंडार को शून्य करना चाहता है, जबकि खुद को विजेता मान रहा ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा है। ईरान की मांग है कि उसके ऊपर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं और विदेशों में जमी उसकी संपत्ति वापस मिले।
पाकिस्तान बना मध्यस्थ, पर राह अब भी मुश्किल
फिलहाल युद्ध के मैदान से हटकर लड़ाई बयानों और कूटनीति के मेज पर आ गई है। सूत्रों की मानें तो ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अपनी शर्तें वाशिंगटन तक पहुँचा दी हैं। हालांकि, आधिकारिक तौर पर तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह व्हाइट हाउस पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं करता। ऐसे में यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या पश्चिम एशिया में वाकई शांति आएगी या यह महज अगले बड़े तूफान से पहले की खामोशी है।
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