
पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध प्रांत बलूचिस्तान एक बार फिर सुलग रहा है। बलूच राष्ट्रवादी नेतृत्व, राजनीतिक दलों और मानवाधिकार संगठनों ने इस्लामाबाद की संघीय सरकार और रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय (GHQ) को दो-टूक शब्दों में चेतावनी देते हुए पूरे बलूचिस्तान से पाकिस्तानी सेना, फ्रंटियर कोर (FC) और खुफिया एजेंसियों को तुरंत वापस बुलाने का नया अल्टीमेटम जारी किया है। बलूच नेताओं का कहना है कि दशकों से जारी सैन्य दमन, न्यायेतर हत्याओं (Extrajudicial Killings) और संसाधनों के दोहन ने आम बलूच जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। इसके साथ ही बलूच नेतृत्व ने संयुक्त राष्ट्र (UN), यूरोपीय संघ और वैश्विक महाशक्तियों से अपील की है कि वे बलूचिस्तान में जारी मानवाधिकार संकट पर अपनी चुप्पी तोड़ें और पाकिस्तानी हुकूमत की जवाबदेही तय करें।
सैन्य छावनी में तब्दील बलूचिस्तान और ‘जबरन गुमशुदगी’ का खौफनाक सच
बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी को स्थानीय आबादी एक सुरक्षा बल के रूप में नहीं बल्कि एक ‘कब्जाधारी फौज’ के रूप में देखती है। प्रांत के चप्पे-चप्पे पर बनी सैन्य चौकियां, आए दिन होने वाले सर्च ऑपरेशन और निर्दोष नागरिकों की धरपकड़ ने पूरे इलाके को एक खुली जेल में तब्दील कर दिया है।
बलूच मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, ‘एनफोर्स्ड डिसअपीयरेंस’ यानी जबरन गायब किए जाने की नीति पाकिस्तान की सेना का सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है। हजारों की संख्या में छात्र, शिक्षक, पत्रकार, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सालों से लापता हैं। ‘बलूच यकजहती कमेटी’ (BYC) जैसी नागरिक संस्थाओं के नेतृत्व में सड़कों पर उतरीं महिलाएं और बहनें अपने परिजनों की रिहाई की मांग को लेकर लगातार धरने दे रही हैं। क्वेटा से लेकर इस्लामाबाद तक निकाले गए लंबे विरोध मार्चों के बावजूद पाकिस्तानी हुकूमत ने इस मानवीय त्रासदी पर कोई ठोस कदम उठाने के बजाय प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज और मुकदमे दर्ज करने का रास्ता चुना है।
संसाधनों की बेतहाशा लूट और स्थानीय जनता की घोर उपेक्षा
बलूचिस्तान की इस बगावत के केंद्र में आर्थिक शोषण और प्राकृतिक संसाधनों की लूट का गहरा दर्द छिपा हुआ है। बलूचिस्तान गैस, तेल, कोयला, तांबा और सोने जैसी बेशकीमती प्राकृतिक संपदाओं से मालामाल है। सुई गैस फील्ड से निकलने वाली प्राकृतिक गैस दशकों से पूरे पाकिस्तान के उद्योगों और घरों को रोशन कर रही है, लेकिन जिस इलाके से यह गैस निकलती है, वहां के स्थानीय बाशिंदे आज भी लकड़ी और कोयला जलाने को मजबूर हैं।
इसी तरह रेको दिक (Reko Diq) और सैंदक जैसी विशाल सोने-तांबे की खानों से होने वाले मुनाफे का बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों और इस्लामाबाद के खजाने में जाता है, जबकि बलूच अवाम बुनियादी स्वास्थ्य, पीने के साफ पानी और शिक्षा जैसी न्यूनतम सुविधाओं से भी महरूम है। बलूच संगठनों का आरोप है कि पंजाब केंद्रित पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान बलूचिस्तान की जमीन और खनिजों पर अपना हक समझता है, लेकिन वहां के मूल निवासियों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाकर रखा गया है।
सीपीईसी, ग्वादर पोर्ट और चीन की दखलअंदाजी से उपजा भारी आक्रोश
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) बलूचिस्तान में असंतोष की आग में घी डालने का काम कर रहा है। अरब सागर के तट पर स्थित रणनीतिक ग्वादर पोर्ट को सीपीईसी का ताज बताया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ग्वादर के स्थानीय मछुआरों को सुरक्षा के नाम पर समंदर में जाने से रोक दिया गया है।
सुरक्षा बाड़ों और चेकपोस्टों के कारण स्थानीय आबादी का जीवन दूभर हो चुका है। बलूच लोगों में यह भावना घर कर चुकी है कि उनकी जमीन को चीन के हवाले किया जा रहा है और विकास के नाम पर उनकी पहचान को मिटाने की साजिश रची जा रही है। यही कारण है कि बलूचिस्तान में सक्रिय सशस्त्र प्रतिरोधक समूह (जैसे बलूच लिबरेशन आर्मी – BLA) लगातार चीनी इंजीनियरों, काफिलों और पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहे हैं।
सशस्त्र प्रतिरोध का नया दौर: ‘ऑपरेशन हेरोफ’ और बढ़ती मारक क्षमता
पाकिस्तानी सेना के दावों के विपरीत, बलूचिस्तान में उग्रवाद कमजोर होने के बजाय और अधिक संगठित व घातक रूप ले चुका है। हाल के महीनों में बलूच विद्रोहियों ने समन्वित हमलों के जरिए पाकिस्तानी सेना के कई शिविरों, हाईवे नाकाबंदी और सुरक्षा काफिलों पर बड़े प्रहार किए हैं।
सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि बलूच लड़ाकों की रणनीति अब केवल छापामार युद्ध तक सीमित नहीं रही है, बल्कि वे आधुनिक हथियारों, सटीक खुफिया सूचनाओं और फिदायीन दस्तों (मजीद ब्रिगेड) के जरिए पाकिस्तानी सेना के सामने गंभीर सामरिक चुनौती पेश कर रहे हैं। बलूच नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तानी सुरक्षा बल स्वेच्छा से पीछे नहीं हटे, तो वे प्रांत के हर कोने को पाकिस्तानी सेना के लिए कब्रगाह बना देंगे।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र से ऐतिहासिक दखल की मांग
बलूच डायस्पोरा और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने वैश्विक मंचों पर अपनी आवाज को पुरजोर तरीके से उठाना शुरू कर दिया है। जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के सत्रों से लेकर वाशिंगटन और लंदन की संसदों के बाहर बलूच कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन कर दुनिया को जमीनी हकीकत से रूबरू कराया है।
बलूच नेतृत्व ने दुनिया से प्रमुख रूप से निम्नलिखित कदम उठाने की अपील की है:
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संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग बलूचिस्तान भेजा जाए, जो सामूहिक कब्रों और लापता व्यक्तियों के मामलों की पड़ताल करे।
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पाकिस्तान को दी जाने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और सैन्य सहायता को मानवाधिकारों की स्थिति से जोड़ा जाए।
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बलूचिस्तान में जारी युद्ध अपराधों के लिए पाकिस्तानी सैन्य कमांडरों पर अंतरराष्ट्रीय अदालतों में मुकदमा चलाया जाए।
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बलूच जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार और उनकी राजनीतिक इच्छा का सम्मान किया जाए।
क्या बंदूकों के दम पर बलूचिस्तान को रोक पाएगा पाकिस्तान?
आर्थिक कंगाली, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक कलह से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए बलूचिस्तान का मोर्चा अब संभालना लगभग नामुमकिन होता जा रहा है। इस्लामाबाद की पारंपरिक नीति हमेशा से असंतोष को सैन्य बल, कठपुतली स्थानीय सरकारों और दमन के जरिए कुचलने की रही है, लेकिन यह रणनीति पूरी तरह विफल साबित हो चुकी है।
बलूचिस्तान की नई पीढ़ी अब किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं है। शिक्षा और सोशल मीडिया के दौर में बलूच युवाओं ने अपने हक और आजादी की लड़ाई को एक नए वैचारिक मुकाम पर पहुंचा दिया है। यदि पाकिस्तान ने समय रहते जमीनी हकीकत को स्वीकार नहीं किया और सेना की वापसी का रास्ता नहीं चुना, तो बलूचिस्तान का यह सुलगता संकट दक्षिण एशिया के पूरे भू-राजनीतिक नक्शे को बदलने की क्षमता रखता है।
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