वर्ल्ड डेस्क, इस्लामाबाद। पश्चिम एशिया में जारी कोहराम के बीच अब दक्षिण एशिया के दो पड़ोसी मुल्कों—पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी खूनी संघर्ष को रोकने की कवायद तेज हो गई है। पिछले एक महीने से सीमा पर जारी ‘खुली जंग’ को थामने के लिए अब चीन ने मध्यस्थ की भूमिका संभाली है। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, दोनों देशों के उच्च स्तरीय प्रतिनिधि इस वक्त उत्तरी चीन के उरुमकी (Urumqi) शहर में एक मेज पर बैठकर संघर्षविराम (Ceasefire) की शर्तों पर चर्चा कर रहे हैं। हालांकि, बीजिंग और इस्लामाबाद ने आधिकारिक तौर पर इस ‘सीक्रेट मिशन’ पर चुप्पी साध रखी है, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज है।
चीन की मध्यस्थता: क्या उरुमकी में पिघलेगी बर्फ?
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच फरवरी से शुरू हुआ तनाव अब तक के सबसे गंभीर दौर में पहुंच चुका है। उत्तरी चीन के शिनजियांग प्रांत के उरुमकी शहर में हो रही इस बैठक का मुख्य उद्देश्य तत्काल प्रभाव से सीमा पर गोलीबारी रोकना है। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चीन इस क्षेत्र में अपने आर्थिक हितों और निवेश को सुरक्षित रखने के लिए दोनों देशों के बीच स्थायी शांति चाहता है। इससे पहले सऊदी अरब, तुर्किये और कतर की कोशिशें नाकाम रही हैं, ऐसे में अब सबकी नजरें ड्रैगन की बिसात पर टिकी हैं।
क्यों भड़की जंग? टीटीपी और सीमा पार आतंकी पनाहगाहों का विवाद
पाकिस्तान और अफगान तालिबान के बीच इस दुश्मनी की जड़ में प्रतिबंधित संगठन ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ (TTP) है। पाकिस्तान का सीधा आरोप है कि 2021 में काबुल की सत्ता संभालने के बाद अफगान तालिबान ने टीटीपी के आतंकियों को सुरक्षित पनाहगाहें दी हैं, जहां से वे पाकिस्तान में आत्मघाती हमले कर रहे हैं। दूसरी ओर, अफगानिस्तान इन आरोपों को सिरे से खारिज करता आया है। इस आरोप-प्रत्यारोप ने सीमा पर भारी गोलाबारी और हवाई हमलों का रूप ले लिया है, जिससे दोनों तरफ जान-माल का भारी नुकसान हुआ है।
‘खुली जंग’ जैसे हालात: आम नागरिकों पर मंडराया संकट
हाल के महीनों में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पाकिस्तान ने इसे ‘खुला युद्ध’ करार दिया था। अफगानिस्तान का दावा है कि पाकिस्तानी हवाई हमलों में काबुल और सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों बेगुनाह नागरिक मारे गए हैं। वहीं, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस संघर्ष को लेकर इसलिए भी चिंतित है क्योंकि इस अस्थिरता का फायदा अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट (IS) जैसे खूंखार आतंकी संगठन उठा सकते हैं, जो इस क्षेत्र में अपनी जड़ें जमाने की ताक में हैं।
पुरानी कोशिशें रहीं नाकाम, क्या अब निकलेगा समाधान?
शांति की राह में पिछली कई कोशिशें बेनतीजा रही हैं। इसी साल ईद-उल-फितर से पहले सऊदी अरब और कतर की मध्यस्थता में हुआ अस्थायी युद्धविराम कुछ ही घंटों में टूट गया था। नवंबर में इस्तांबुल में हुई शांति वार्ता भी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकी थी। अब सवाल यह है कि क्या चीन, पाकिस्तान पर अपने आर्थिक प्रभाव और अफगानिस्तान के साथ अपने बढ़ते व्यापारिक रिश्तों का इस्तेमाल कर इस जंग को रोक पाएगा? उरुमकी की बैठक के नतीजे आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेंगे।
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