तमिलनाडु में गौहत्या पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, मद्रास हाई कोर्ट के पूर्ण प्रतिबंध के फैसले को पलटा

देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने तमिलनाडु में गौहत्या और पशु वध को लेकर सोमवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाई कोर्ट के उस विवादास्पद आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें बकरीद या किसी भी अन्य दिन राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े के वध पर पूरी तरह प्रतिबंध (Total Ban) लगाने का निर्देश दिया गया था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच का आदेश

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई की। अदालत ने इस मामले में नोटिस जारी करते हुए हाई कोर्ट के पूर्ण प्रतिबंध वाले आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:

“मदरास हाई कोर्ट का आदेश, जिसमें पूरे राज्यभर में गाय और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कही गई थी, उसके आखिरी पैराग्राफ में शुरुआती आधार में ‘सुधार’ की अत्यंत आवश्यकता है।”

वैधानिक कानून बनाम न्यायिक विधान: राज्य सरकार के तर्क

तमिलनाडु राज्य सरकार की ओर से देश के दिग्गज और वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंहवी अदालत में पेश हुए। राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ निम्नलिखित मजबूत कानूनी दलीलें पेश कीं:

  • तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 का उल्लंघन: राज्य ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट का फैसला 1958 के मौजूदा राज्य कानून के बिल्कुल उलट है। यह अधिनियम सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र के आधार पर 10 वर्ष से अधिक आयु की उन गायों के वध की अनुमति देता है, जो खेती/काम करने और प्रजनन (Breeding) के लिए पूरी तरह अनुपयुक्त हो चुकी हैं।

  • केंद्रीय व स्थानीय नियमों का हवाला: इसके अलावा, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960, वधगृह नियम 2001 और तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम 2023 जैसे कानून पशु वध की सख्त शर्तों को रेगुलेट (नियंत्रित) करते हैं, लेकिन उन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते।

  • न्यायिक अतिक्रमण का आरोप: राज्य सरकार ने साफ कहा कि वध पर पूरी तरह से प्रतिबंध का निर्देश देकर हाई कोर्ट ने स्थापित वैधानिक कानून के स्थान पर खुद का ‘न्यायिक विधान’ (Judicial Legislation) लागू करने की कोशिश की है, जो अनुचित है।

आखिर क्या था मद्रास हाई कोर्ट का वह फैसला?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायण की बेंच ने 27 मई को हिंदू मक्कल कच्ची के महासचिव के. सूर्य प्रशांत द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर आदेश पारित किया था।

याचिकाकर्ता ने केवल यह मांग की थी कि त्योहारों के दौरान पशु वध या बलि केवल सरकार द्वारा तय और अधिकृत जगहों पर ही की जाए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस मांग से आगे बढ़ते हुए एक व्यापक आदेश जारी कर दिया और राज्य में किसी भी दिन, कहीं भी गायों और बछड़ों की बलि या वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। अपना फैसला सुनाते समय हाई कोर्ट ने एक पुराने सरकारी आदेश और सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों का हवाला दिया था, जिसमें कहा गया था कि त्योहारों के लिए गायों का वध करना कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी है।

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