नई दिल्ली। राजनीति में कहा जाता है कि वक्त बदलते देर नहीं लगती, लेकिन आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए शुक्रवार का दिन किसी बुरे सपने जैसा साबित हुआ। दिल्ली की सियासत में हलचल तब और बढ़ गई जब यह साफ हुआ कि अरविंद केजरीवाल को झटका देने वालों में सिर्फ बागी नेता ही नहीं, बल्कि वो ‘दोस्त’ भी शामिल है जिसने मुश्किल वक्त में केजरीवाल परिवार को अपने घर में पनाह दी थी। हम बात कर रहे हैं अशोक मित्तल की, जिन्होंने 2024 में जेल से बाहर आने के बाद केजरीवाल को अपना सरकारी आवास सौंपा था।
कुछ घंटे पहले घर छोड़ा, फिर ‘दोस्त’ ने पार्टी छोड़ी
अशोक मित्तल और अरविंद केजरीवाल के बीच के रिश्तों की कड़वाहट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस दिन (शुक्रवार) केजरीवाल ने अशोक मित्तल के 5, फिरोजशाह रोड स्थित सरकारी आवास को खाली किया और नए घर में शिफ्ट हुए, उसके कुछ ही घंटों बाद मित्तल ने भाजपा का दामन थाम लिया। हैरानी की बात यह है कि इतने महीनों तक साथ रहने के बावजूद केजरीवाल को अपने ही ‘करीबी’ के मन में चल रही बगावत की भनक तक नहीं लगी।
क्यों बिगड़ी बात? 2 अप्रैल की वो घटना
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बगावत की स्क्रिप्ट रातों-रात नहीं लिखी गई। इसके पीछे लंबे समय से चल रहा शक्ति प्रदर्शन और आंतरिक असंतोष था:
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राघव चड्ढा का अपमान: 2 अप्रैल 2026 को अरविंद केजरीवाल ने अचानक राघव चड्ढा को राज्यसभा में उप-नेता के पद से हटा दिया और उनकी जगह अशोक मित्तल को नियुक्त किया। जानकारों का मानना है कि यह चड्ढा को किनारे करने की कोशिश थी।
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अशोक मित्तल की अपनी चिंताएं: दिलचस्प बात यह है कि जिस मित्तल को चड्ढा की जगह पद दिया गया, वे खुद भी पार्टी की कार्यशैली से खुश नहीं थे। व्यावसायिक दबाव और ईडी (ED) की कार्रवाई के बीच उन्होंने भाजपा में सुरक्षा तलाशना बेहतर समझा।
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दो-तिहाई का गणित: राघव चड्ढा अकेले इस्तीफा नहीं दे सकते थे क्योंकि उन पर दल-बदल कानून की तलवार लटकती। इसलिए उन्होंने 7 सांसदों (संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी) का कुनबा तैयार किया ताकि यह कानूनी रूप से ‘विलय’ बन सके।
केजरीवाल का ‘फेल’ हुआ आखिरी कार्ड
सूत्रों का दावा है कि शुक्रवार दोपहर तक केजरीवाल को इस महा-बगावत का अहसास हो गया था। उन्होंने डैमेज कंट्रोल के लिए शाम को सभी सांसदों को अपने आवास पर बुलाया था। केजरीवाल ने उन्हें ‘अगले कार्यकाल में टिकट’ देने का बड़ा लालच भी दिया, लेकिन बागी सांसदों ने मुख्यमंत्री से मिलने के बजाय सीधे भाजपा मुख्यालय का रुख किया।
स्वाति मालीवाल और बिभव कुमार विवाद
इस बगावत का एक और बड़ा सिरा स्वाति मालीवाल से जुड़ा है। मई 2024 में मुख्यमंत्री आवास पर बिभव कुमार द्वारा कथित मारपीट के बाद से ही मालीवाल और पार्टी नेतृत्व के बीच खाई गहरी हो गई थी। उन्होंने इस मौके का इस्तेमाल पार्टी से औपचारिक रूप से नाता तोड़ने के लिए किया।
आम आदमी पार्टी के लिए यह दोहरा झटका है—एक तरफ संगठन के स्तंभ ढह गए हैं और दूसरी तरफ भरोसे के उन रिश्तों में दरार आ गई है जिन्होंने मुश्किल वक्त में केजरीवाल का साथ दिया था।
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