[
देश की एक उच्च अदालत ने गोद लिए हुए बच्चों (Adopted Child) के अधिकारों और माता-पिता के साथ उनके भावनात्मक संबंधों को लेकर एक बेहद मानवीय और ऐतिहासिक टिप्पणी की है। अदालत की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट कर दिया कि कानून और समाज की नजर में गोद लिया हुआ बच्चा, तथाकथित ‘सगे’ या जैविक बच्चे से किसी भी तरह से अलग नहीं होता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि गोद लेने की प्रक्रिया केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह मातृत्व और पितृत्व के उस अटूट बंधन को मान्यता देती है जो खून के रिश्तों से भी ऊपर हो सकता है।
गोद लेना माता-पिता होने के एहसास का गहरा पुष्टिकरण
माननीय बेंच ने भावनाओं और कानून के सामंजस्य पर चर्चा करते हुए कहा कि गोद लेने का कार्य माता-पिता होने के एहसास को उतना ही गहरा पुष्टिकरण देता है, जितना कि एक जैविक संतान। कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि कई मामलों में यह एहसास शायद जैविक संबंधों से भी ज्यादा गहरा और संवेदी हो सकता है। यह टिप्पणी उन परिवारों के लिए एक बड़ी राहत और सम्मान की बात है जो समाज में गोद लिए हुए बच्चों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना करते हैं।
सामाजिक रूढ़ियों पर कानून का कड़ा प्रहार
अदालत ने अपने संबोधन में ‘तथाकथित सगे बच्चे’ शब्द का उपयोग कर उन सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार किया है जो अक्सर दत्तक ग्रहण को दोयम दर्जे का मानती हैं। बेंच का मानना है कि एक बच्चा जब किसी परिवार का हिस्सा बनता है, तो उसके अधिकार, भावनाएं और पारिवारिक स्थिति पूरी तरह से समान होती है। कानूनी तौर पर भी वह बच्चा अपने माता-पिता की संपत्ति और स्नेह का उतना ही हकदार है जितना कि कोई अन्य संतान।
भविष्य के फैसलों के लिए नजीर बनेगा यह आदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बेंच की यह संजीदा टिप्पणी भविष्य में गोद लेने से जुड़े विवादों और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण में एक मिसाल (Precedent) का काम करेगी। इससे न केवल गोद लेने की प्रक्रिया को सामाजिक स्वीकार्यता मिलेगी, बल्कि उन बच्चों के मन में भी सुरक्षा का भाव जागेगा जो एक नए परिवार में अपनी पहचान तलाश रहे हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि परिवार का आधार केवल जीव विज्ञान (Biology) नहीं, बल्कि प्रेम और जिम्मेदारी है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया