इस्लामाबाद/वॉशिंगटन। पाकिस्तान की डूबती अर्थव्यवस्था और फेल होती कूटनीति के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। पिछले एक साल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में जो जमी बर्फ पिघली है, उसके पीछे कोई मंझा हुआ नेता नहीं, बल्कि 35 साल का एक नौजवान है। ‘क्रिप्टो डिप्लोमेसी’ के जरिए पाकिस्तान अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का ‘खास’ बन गया है। आलम यह है कि फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और ट्रंप के बीच बढ़ती नजदीकी अब ईरान-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थता तक जा पहुंची है। आखिर कौन है वह शख्स जिसने बिटक्वाइन और डिजिटल एसेट्स के दम पर पाकिस्तान की तकदीर बदल दी? आइए जानते हैं बिलाल बिन साकिब की पूरी कहानी।
लाहौर की गलियों से एलएसई तक: संघर्ष से सफलता का सफर
इस पूरी पटकथा के लेखक हैं बिलाल बिन साकिब। लाहौर में जन्मे बिलाल का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। एक वक्त था जब कॉलेज के दिनों में उन्हें टॉयलेट साफ करने जैसा काम भी करना पड़ा था, लेकिन उनकी प्रतिभा उन्हें लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) तक ले गई। उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर ‘तयाबा’ जैसी संस्था बनाई और कोविड के दौरान ‘वन मिलियन मील्स’ अभियान चलाकर ब्रिटिश राजघराने तक से सम्मान पाया। आज वही बिलाल पाकिस्तान के वर्चुअल एसेट रेगुलेटरी अथॉरिटी के चेयरमैन हैं और ट्रंप परिवार के साथ पाकिस्तान के व्यापारिक समझौतों की धुरी बने हुए हैं।
बिटक्वाइन ने कैसे मिलाए ट्रंप और आसिम मुनीर के हाथ?
अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन का मानना है कि ट्रंप प्रशासन में व्यक्तिगत और व्यापारिक रिश्तों की बहुत अहमियत होती है। पाकिस्तान ने इस नब्ज को पकड़ा और ‘क्रिप्टो डिप्लोमेसी’ को अपना नया हथियार बनाया। बिलाल बिन साकिब ने पाकिस्तान में वर्चुअल एसेट्स के लिए कड़े कानून बनवाए और ग्लोबल कंपनियों को न्योता दिया। सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब पाकिस्तान ने ट्रंप परिवार की कंपनी ‘वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल’ के साथ स्टेबलकॉइन और डिजिटल सेवाओं को लेकर डील की। लास वेगास की बिटक्वाइन कॉन्फ्रेंस में बिलाल ने जब पाकिस्तान को नए क्रिप्टो हब के रूप में पेश किया, तो वहां जेडी वेंस और ट्रंप के बेटे एरिक ट्रंप भी मौजूद थे। इसी व्यापारिक भरोसे ने आसिम मुनीर और ट्रंप के बीच कूटनीतिक सेतु का काम किया।
ईरान-अमेरिका के बीच बिचौलिया बनने की तैयारी
कभी क्रिप्टो से दूरी बनाने वाला पाकिस्तान आज इसे अपनी अर्थव्यवस्था की संजीवनी मान रहा है। इसी ‘बिप्लोमेसी’ (बिटक्वाइन डिप्लोमेसी) का नतीजा है कि पाकिस्तान अब ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता आयोजित करने का दावा कर रहा है, जिस पर ट्रंप ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं। हालांकि, पूर्व रॉ चीफ और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ इसे पाकिस्तान की ‘असामान्य दौर में असामान्य चाल’ बता रहे हैं। बिलाल बिन साकिब की इस रणनीति ने पाकिस्तान को वॉशिंगटन के गलियारों में फिर से प्रासंगिक बना दिया है, लेकिन क्या यह डिजिटल दोस्ती लंबे समय तक टिक पाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
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