नई दिल्ली: रणबीर कपूर की फिल्म ‘एनिमल’ ने अपनी बेतहाशा हिंसा और पिता-पुत्र के जटिल रिश्ते से बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से ठीक 28 साल पहले, साल 1996 में एक ऐसी फिल्म आई थी जिसने बिना किसी आधुनिक मशीन गन या भारी हथियारों के वह दहशत पैदा की थी, जो आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा है? हम बात कर रहे हैं राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी कल्ट क्लासिक फिल्म ‘घातक’ की।
‘घातक’ vs ‘एनिमल’: पिता-पुत्र के रिश्ते की गहरी परतें
जहाँ ‘एनिमल’ में रणबीर कपूर और अनिल कपूर के बीच एक जुनूनी और हिंसक रिश्ता दिखाया गया है, वहीं ‘घातक’ में काशी (सनी देओल) और उनके पिता (अमरीश पुरी) के बीच का रिश्ता सम्मान और सिद्धांतों पर आधारित था। ‘घातक’ में हिंसा सिर्फ पर्दे पर खून बहाने के लिए नहीं थी, बल्कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए थी। जब काशी को समाज के सामने ‘कुत्ता’ बनने पर मजबूर किया जाता है, तो वह सीन किसी भी आधुनिक एक्शन सीक्वेंस से ज्यादा रोंगटे खड़े कर देने वाला और भावनात्मक रूप से झकझोर देने वाला साबित होता है।
कात्या vs अबरार: कौन है ज्यादा खूंखार?
‘एनिमल’ में बॉबी देओल का ‘अबरार’ वाला किरदार खामोश और डरावना था, लेकिन ‘घातक’ का विलेन कात्या (डैनी डेन्जोंगपा) भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे क्रूर खलनायक माना जाता है। डैनी ने कात्या के किरदार में ऐसी मानसिक दहशत भरी थी कि पूरी बस्ती उसके नाम से कांपती थी। उनका कालजयी डायलॉग—”ये सात भाई, सात के सात मरेंगे, एक साथ मरेंगे… और मारने वाला भी हम ही होगा”—आज भी विलेन की क्रूरता का सबसे बड़ा उदाहरण है।
क्यों ‘घातक’ आज भी है ‘मास्टरक्लास’?
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अमरीश पुरी की शानदार एक्टिंग: फिल्म में बीमार पिता के रूप में अमरीश पुरी ने जो अभिनय किया, वह फिल्म की आत्मा है। ‘एनिमल’ के मुकाबले यहाँ पिता-पुत्र का प्रेम और टकराव ज्यादा वास्तविक और दिल को छू लेने वाला लगता है।
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सनी देओल का ‘रॉ’ गुस्सा: सनी देओल ने बिना किसी आधुनिक हथियार के, सिर्फ अपने मुक्कों और आंखों के गुस्से से जो प्रभाव छोड़ा, वह आज के दौर के डायरेक्टर्स के लिए एक मिसाल है।
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रेटिंग और कद्र: 28 साल बीत जाने के बाद भी 7.5 IMDb रेटिंग यह साबित करती है कि कंटेंट के मामले में ‘घातक’ आज की कई बड़ी फिल्मों पर भारी पड़ती है।
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