वाशिंगटन/ब्रसेल्स। ईरान के साथ जारी भीषण युद्ध के बीच अमेरिका और उसके सबसे पुराने सहयोगियों यानी यूरोपीय देशों के बीच दरार अब एक गहरी खाई में तब्दील होती दिख रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाराजगी का असर अब सीधा रक्षा सौदों पर पड़ने लगा है। अमेरिका ने कई यूरोपीय देशों को स्पष्ट कर दिया है कि वे फिलहाल उन्हें हथियारों की डिलीवरी नहीं कर पाएंगे। इस फैसले ने न केवल नाटो (NATO) देशों की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को भी हिलाकर रख दिया है।
‘ईरान युद्ध’ बना हथियारों की डिलीवरी में बाधा
अमेरिकी प्रशासन ने ‘विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम’ (FMS) के तहत होने वाली सप्लाई को टालने के पीछे ईरान युद्ध को मुख्य कारण बताया है। अमेरिका का तर्क है कि मिडिल ईस्ट में जारी सैन्य अभियान की वजह से उनका हथियारों का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है।
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प्रभावित क्षेत्र: सूत्रों के अनुसार, बाल्टिक और स्कैंडिनेवियाई क्षेत्र के देश इस देरी से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
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प्राथमिकता: व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि वर्तमान में हथियारों की सबसे ज्यादा जरूरत मिडिल ईस्ट के मोर्चे पर है, इसलिए यूरोप को अभी इंतजार करना होगा।
ट्रंप की बौखलाहट: “अकेले क्यों लड़े अमेरिका?”
इस सप्लाई कट के पीछे सिर्फ तकनीकी कारण नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक नाराजगी भी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात से बेहद खफा हैं कि यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका का खुलकर साथ नहीं दिया।
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युद्ध की निंदा: कई यूरोपीय देशों ने न केवल इस युद्ध से दूरी बनाई है, बल्कि इसकी सार्वजनिक निंदा भी की है।
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होर्मुज संकट: अमेरिका का आरोप है कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को खुलवाने और इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करने में यूरोप हाथ पर हाथ धरे बैठा है, जिससे सारा बोझ अमेरिका की तिजोरी और हथियारों के जखीरे पर आ गया है।
खाली होते अमेरिकी गोदाम: एक बड़ी चुनौती
हकीकत यह भी है कि अमेरिका पिछले कुछ वर्षों से लगातार कई मोर्चों पर हथियारों की सप्लाई कर रहा है:
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यूक्रेन और गाजा: 2022 से रूस-यूक्रेन युद्ध और 2023 से गाजा संघर्ष में अमेरिका ने अरबों डॉलर के आर्टिलरी शेल, एंटी-टैंक मिसाइलें और गोला-बारूद खर्च किए हैं।
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ईरान का पलटवार: तेहरान द्वारा दागी गई सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन्स को नष्ट करने के चक्कर में अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम (जैसे पैट्रियट और इंटरसेप्टर्स) के स्टॉक पर भारी दबाव पड़ा है।
नाटो का भविष्य और ट्रंप की ‘कड़ी चेतावनी’
राष्ट्रपति बनने के बाद से ही ट्रंप नाटो देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने और अमेरिकी हथियार खरीदने का दबाव बनाते रहे हैं। अब उन्होंने साफ कर दिया है कि अगर यूरोप को अपनी सुरक्षा चाहिए, तो उसे खुद जिम्मेदारी उठानी होगी।
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बजट कटौती की धमकी: ट्रंप ने नाटो सहयोगियों को खरी-खोटी सुनाते हुए बजट काटने और यहाँ तक कि संगठन से अलग होने के संकेत भी दिए हैं।
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यूरोप की चिंता: यूरोपीय देशों के लिए यह स्थिति ‘दोहरी मार’ जैसी है—एक तरफ रूस का खतरा मंडरा रहा है और दूसरी तरफ उनके सबसे भरोसेमंद साथी अमेरिका ने हथियारों की डिलीवरी पर ब्रेक लगा दिया है।
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