ट्रंप सरकार का यू-टर्न: भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए मिली 30 दिनों की ‘स्पेशल छूट’, जानें क्या है इसके पीछे का बड़ा खेल

नई दिल्ली/वॉशिंगटन। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी भीषण जंग ने दुनिया के ऊर्जा बाजार (Energy Market) में जो खलबली मचाई है, उसका असर अब अमेरिका की विदेश नीति पर दिखने लगा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रति अपने सख्त रुख को थोड़ा नरम करते हुए एक बड़ा फैसला लिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की ‘अस्थायी छूट’ (Waiver) देने का ऐलान किया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब ईरान द्वारा ‘होर्मुज की खाड़ी’ (Strait of Hormuz) में तेल की सप्लाई को बंधक बनाने की कोशिशों से वैश्विक स्तर पर ईंधन का संकट गहराने लगा है।

‘ईरान की दादागिरी’ और भारत की जरूरत: क्यों झुका अमेरिका?

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया के जरिए इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि यह कदम वैश्विक बाजार में तेल की निरंतरता बनाए रखने के लिए उठाया गया है। दरअसल, ईरान-इजरायल युद्ध के कारण खाड़ी देशों से होने वाली तेल की सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है। भारत, जो अपनी जरूरत का करीब 90% तेल आयात करता है, के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक थी। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन नहीं चाहता कि ऊर्जा की कमी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो, इसलिए उन्होंने भारत को ‘स्टॉप-गैप’ व्यवस्था के तहत रूस से तेल लेने की अनुमति दी है।

30 दिन की छूट या कूटनीतिक दबाव?

भले ही अमेरिका ने इसे ‘छूट’ का नाम दिया है, लेकिन इसके पीछे की शर्तें काफी पेचीदा हैं। यह छूट केवल उन्हीं रूसी तेल कार्गो के लिए है जो 5 मार्च 2026 से पहले जहाजों पर लोड हो चुके थे और समुद्र में फंसे हुए थे। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह 4 अप्रैल 2026 तक की एक छोटी अवधि की राहत है, जिससे रूस को कोई बड़ा वित्तीय लाभ नहीं होगा। ट्रंप प्रशासन का असली उद्देश्य यह है कि भारत धीरे-धीरे रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे और अमेरिकी ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाए।

भारत का स्टैंड: ‘देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि’

भारत में इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों और कुछ विशेषज्ञों ने सवाल उठाया है कि क्या भारत जैसे संप्रभु देश को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वाशिंगटन की अनुमति की आवश्यकता है? हालांकि, भारत सरकार ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा के आधार पर ही फैसले लेगी। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने पहले ही संकेत दिया था कि भारत के पास ऊर्जा आपूर्ति के ऐसे वैकल्पिक रास्ते हैं जो होर्मुज की खाड़ी से होकर नहीं गुजरते, और रूस के साथ सहयोग इसी रणनीति का हिस्सा है।

क्या फिर से बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?

इस 30 दिनों की राहत से भारतीय रिफाइनरियों को कुछ समय के लिए सांस लेने की मोहलत जरूर मिली है, लेकिन संकट अभी टला नहीं है। यदि मिडिल ईस्ट में तनाव लंबा खिंचता है और 4 अप्रैल के बाद अमेरिका इस छूट को आगे नहीं बढ़ाता, तो भारत के लिए कच्चे तेल का आयात महंगा हो सकता है। फिलहाल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 89 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुँच गई हैं। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस वैश्विक उठापटक के बीच घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कैसे स्थिर रखा जाए।

Check Also

पाकिस्तान में जनरल असीम मुनीर बने सुपर कमांडर: डिफेंस फोर्सेज एक्ट 2026 से मिली तीनों सेनाओं की कमान, न्यूक्लियर कंट्रोल पर भी मजबूत हुई पकड़

इस्लामाबाद के राजनीतिक गलियारों से लेकर रावलपिंडी के जनरल हेडक्वार्टर्स (GHQ) तक पाकिस्तान की सत्ता …