अंतरराष्ट्रीय डेस्क: अफगानिस्तान और पूरे मध्य एशिया (Central Asia) के भू-राजनीतिक समीकरणों में एक ऐसा ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिल रहा है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले तक नामुमकिन थी। जिस सोवियत संघ (अब रूस) के खिलाफ 1980 के दशक में मुजाहिदीन (जो बाद में तालिबान बने) ने एक खूनी और लंबा युद्ध लड़ा था, आज उसी रूस के साथ तालिबान शासन ने अपने अब तक के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण रक्षा-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
27 मई 2026 को काबुल में हुए इस समझौते ने अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस रणनीतिक झुकाव के पीछे पड़ोसी देश पाकिस्तान की आक्रामक नीतियां और अमेरिका के साथ उसकी बढ़ती नजदीकियों को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।
पाकिस्तान के हमलों और अमेरिकी समर्थन ने बदला रुख
इस समझौते की पृष्ठभूमि को समझने के लिए इस साल की शुरुआत में जाना होगा। फरवरी 2026 में पाकिस्तान ने सीमा पार आतंकवाद का हवाला देते हुए काबुल और कंधार समेत अफगानिस्तान के कई प्रमुख शहरों पर हवाई व सैन्य हमले किए थे। इन हमलों के बाद पाकिस्तान और तालिबान सरकार के रिश्ते अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।
मामला तब और बिगड़ा जब अमेरिका ने खुले तौर पर पाकिस्तान की इस सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया और इसे पाकिस्तान का ‘आत्मरक्षा का अधिकार’ (Right to Self-Defense) करार दिया। पाकिस्तान को अमेरिका (वाशिंगटन) की ‘कठपुतली’ बनते देख और खुद को अलग-थलग पाकर तालिबान ने अपनी सुरक्षा और कूटनीति के लिए रूस को एक मजबूत रणनीतिक साझेदार के रूप में चुन लिया।
सैन्य-तकनीकी सहयोग: रूसी हथियारों का पुनर्जन्म
हालांकि, इस समझौते के सभी बिंदुओं को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन दोनों पक्षों ने इसे पूरी तरह से एक ‘तकनीकी-सैन्य सहयोग समझौता’ बताया है।
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रूसी उपकरणों का रखरखाव: अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मौलवी मोहम्मद याकूब मुजाहिद और रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु द्वारा हस्ताक्षरित इस डील के तहत, रूस अब अफगानिस्तान में मौजूद सोवियत और रूसी मूल के सैन्य उपकरणों की मरम्मत और रखरखाव के लिए तकनीकी ढांचा तैयार करेगा।
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Mi-17 हेलीकॉप्टरों का बेड़ा: तालिबान के पास वर्तमान में 100 से अधिक रूसी मूल के Mi-17 हेलीकॉप्टर, हजारों कामाज ट्रक, बख्तरबंद गाड़ियां और भारी मात्रा में छोटे हथियार हैं, जो 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी और अफगान सरकार के पतन के बाद तालिबान के हाथ लगे थे। अब रूस इन सभी घातक हथियारों और हेलीकॉप्टरों को फिर से सर्विसिंग कर हवा में उड़ने और जंग के लिए तैयार करेगा।
रूस और तालिबान के करीब आने के 3 मुख्य कारण
| कारण | विवरण |
| साझा दुश्मन: ISKP | ‘इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रांत’ (ISKP) दोनों का साझा दुश्मन है। 2024 में मॉस्को के क्रोकस सिटी हॉल हमले (151 मौतें) के बाद रूस इस आतंकी संगठन को कुचलना चाहता है। तालिबान भी इसे अपने शासन के लिए बड़ा खतरा मानता है। |
| औपचारिक मान्यता | रूस ने अपनी दूरगामी सोच के तहत साल 2025 में तालिबान शासन को औपचारिक राजनयिक मान्यता (Formal Diplomatic Recognition) देने वाले पहले वैश्विक देश के रूप में कदम बढ़ाया था। |
| क्षेत्रीय संतुलन | पाकिस्तान-अमेरिका के नए सैन्य और रणनीतिक ब्लॉक को टक्कर देने के लिए रूस और अफगानिस्तान का एक साथ आना दोनों की मजबूरी बन गया है। |
‘रूस चाहता है एक स्वतंत्र और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान’
रूस के सुरक्षा परिषद के सचिव सर्गेई शोइगु ने समझौते के बाद कहा कि मॉस्को, अफगानिस्तान को एक स्थिर, स्वतंत्र और शांतिपूर्ण देश के रूप में देखना चाहता है। उन्होंने आतंकवाद और ड्रग्स तस्करी के खिलाफ तालिबान के कड़े कदमों की सराहना भी की।
वहीं, राजनीतिक विश्लेषक अब्दुल बसीर बसीरत का मानना है कि इस क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन बनाए रखने के लिए यह समझौता बेहद आवश्यक था। यदि पाकिस्तान को अमेरिका का निरंतर समर्थन मिलता रहा, तो आने वाले समय में अफगानिस्तान पूरी तरह से रूस और चीन के पाले में खड़ा दिखाई देगा।
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