UP News: पुच एआई का 25 हजार करोड़ का एमओयू रद्द, योगी सरकार का बड़ा फैसला; कंपनी की वित्तीय साख पर उठे सवाल

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में निवेश के बड़े-बड़े दावे करने वाली कंपनी ‘पुच एआई’ (Puch AI) को योगी सरकार ने बड़ा झटका दिया है। सरकार ने कंपनी के साथ साइन किए गए 25 हजार करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। ‘इन्वेस्ट यूपी’ द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, कंपनी के वित्तीय स्रोत विश्वसनीय नहीं पाए गए और वह निर्धारित मानकों पर खरी नहीं उतरी। 23 मार्च 2026 को हुए इस करार के निरस्त होने के बाद अब दोनों पक्षों के बीच कोई कानूनी दायित्व शेष नहीं रहेगा।

महज 43 लाख की हैसियत और 25 हजार करोड़ का निवेश?

इस निवेश प्रस्ताव को लेकर शुरुआत से ही सवाल उठ रहे थे। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों ने दावा किया था कि जिस कंपनी की नेटवर्थ महज 43 लाख रुपये के आसपास है, वह 25 हजार करोड़ रुपये का निवेश कैसे कर सकती है? ‘इन्वेस्ट यूपी’ ने जब ड्यू डिलिजेंस (गहन जांच) प्रक्रिया शुरू की और कंपनी से वित्तीय क्षमताओं से जुड़े ठोस दस्तावेज मांगे, तो कंपनी समय पर इन्हें उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रही। जांच में यह साफ हो गया कि प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट के लिए कंपनी की आर्थिक स्थिति पर्याप्त नहीं है।

पारदर्शिता और सुशासन के लिए उठाया कड़ा कदम

राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश में निवेश की पारदर्शिता और सुशासन (Good Governance) के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए लिया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर की गई इस कार्रवाई से यह संदेश गया है कि प्रदेश में केवल उन्हीं निवेशकों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनकी वित्तीय विश्वसनीयता और क्षमताएं पूरी तरह प्रमाणित होंगी। सरकार ने कहा कि भविष्य में एमओयू साइन करने से पहले ‘इन्वेस्ट मित्र 3.0’ जैसे पोर्टल्स के जरिए निवेशकों की साख की और भी बारीकी से जांच की जाएगी।

विपक्ष के घेरे में आने के बाद सरकार ने दिखाई सख्ती

25 हजार करोड़ के इस भारी-भरकम निवेश पर विपक्ष ने भी सरकार को घेरा था, जिसके बाद औद्योगिक विकास विभाग और ‘इन्वेस्ट यूपी’ ने प्रोजेक्ट की दोबारा समीक्षा की। समीक्षा के दौरान निवेशक से मांगे गए आवश्यक दस्तावेज और सूचनाएं न मिलने पर सरकार ने प्रोटोकॉल के तहत एमओयू निरस्त करने का कड़ा फैसला लिया। इस घटनाक्रम को भविष्य में फर्जी या अक्षम निवेशकों पर लगाम कसने और गंभीर औद्योगिक इकाइयों को बढ़ावा देने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

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