इस्लामाबाद, पाकिस्तान। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार अमेरिका और ईरान के बीच होने जा रही सबसे बड़ी ऐतिहासिक वार्ता को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली इस ‘करो या मरो’ की बैठक में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बघेर गालिबाफ हिस्सा ले रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये दोनों नेता एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर बात करेंगे या फिर अलग-अलग कमरों में बैठकर संदेशों का आदान-प्रदान करेंगे?
क्या अलग-अलग कमरों में होगी बातचीत?
इस महा-बैठक के स्वरूप को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं:
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प्रॉक्सिमिटी टॉक्स का दावा: न्यूज एजेंसी ‘AFP’ की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने नहीं बैठेंगे। वे अलग-अलग कमरों में मौजूद रहेंगे और पाकिस्तानी अधिकारी एक ‘बिचौलिए’ (Mediator) की भूमिका निभाते हुए एक कमरे से दूसरे कमरे तक संदेश और प्रस्ताव लेकर जाएंगे।
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सीधी बातचीत की संभावना: इसके उलट, पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अखबार ‘डॉन’ ने दावा किया है कि यह 1979 के बाद पहला मौका हो सकता है जब दोनों देशों के बीच इतनी उच्च स्तरीय सीधी बातचीत होगी।
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पाकिस्तान की तैयारी: चीन की न्यूज एजेंसी ‘शिन्हुआ’ का कहना है कि मेजबान होने के नाते पाकिस्तान ने दोनों ही स्थितियों के लिए प्रोटोकॉल तैयार कर रखे हैं।
शहबाज शरीफ से अलग-अलग मुलाकातें
मुख्य वार्ता की मेज पर बैठने से पहले शिष्टाचार का दौर शुरू हो चुका है। ईरानी न्यूज एजेंसी ‘मेहर’ के अनुसार, मुख्य वार्ता शुरू होने से पहले अमेरिकी और ईरानी डेलिगेशन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। ‘तस्नीम’ एजेंसी ने बताया कि ईरानी टीम दोपहर करीब 1:00 बजे पीएम शरीफ से मिल चुकी है।
बैठक की अवधि पर विरोधाभास
अमेरिकी मीडिया और ईरानी मीडिया में बैठक के समय को लेकर भी मतभेद हैं:
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सीएनएन (CNN): अमेरिकी चैनल के अनुसार, यह बातचीत काफी जटिल है और कई दिनों तक चल सकती है।
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तस्नीम (Tasnim): ईरानी न्यूज एजेंसी ने कई दिनों की बात को खारिज करते हुए कहा कि यह बैठक केवल एक दिन में ही संपन्न करने की योजना है।
पाकिस्तान की ‘करो या मरो’ वाली भूमिका
पाकिस्तान ने इस वार्ता को सफल बनाने के लिए विशेषज्ञों की एक विशेष टीम तैनात की है, जो परमाणु मुद्दों और नेविगेशन जैसे तकनीकी विषयों पर मदद करेगी। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इसे ‘करो या मरो’ की स्थिति बताया है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि इस मध्यस्थता से वेस्ट एशिया में 28 फरवरी से जारी तनाव कम होगा।
ईरान की ‘नो-कॉम्प्रोमाइज’ शर्त
इतने सस्पेंस के बीच ईरान ने अपना रुख लचीला नहीं किया है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने साफ कर दिया है कि जब तक लेबनान में तुरंत युद्धविराम नहीं होता और ईरान की अन्य शर्तें (जैसे जब्त संपत्तियों की वापसी) नहीं मानी जातीं, तब तक बातचीत के नतीजे निकलने की उम्मीद कम है। मिस्र, तुर्की और चीन जैसे देश भी इस वार्ता पर अपनी नजरें जमाए हुए हैं।
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