राम मंदिर चढ़ावा चोरी: आरोपियों का केस न लड़ने के फैसले पर भड़की VHP, वीएचपी प्रमुख ने वकीलों को दिलाई सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश की याद

अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के आरोपियों को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत और कानूनी गलियारों में एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अयोध्या बार एसोसिएशन द्वारा आरोपियों का केस न लड़ने और केस लड़ने वाले वकील पर ₹5,00000 का भारी-भरकम जुर्माना लगाने के प्रस्ताव का विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने कड़ा विरोध किया है।

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रह चुके वीएचपी के केंद्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट शेयर करते हुए बार एसोसिएशन के इस फैसले को पूरी तरह से गैर-कानूनी, असंवैधानिक और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ बताया है। उन्होंने वकीलों को सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले की याद दिलाते हुए इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

क्या है अयोध्या बार एसोसिएशन का प्रस्ताव और VHP की आपत्ति?

हाल ही में अयोध्या राम मंदिर के दानपात्र से चढ़ावे की रकम चोरी करने के मामले में कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई थी। इसके विरोध में अयोध्या बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित कर घोषणा की कि बार का कोई भी सदस्य इन आरोपियों की पैरवी (बचाव) अदालत में नहीं करेगा। यदि कोई वकील इस आदेश का उल्लंघन करता है, तो उस पर 5 लाख रुपये का आर्थिक दंड लगाया जाएगा।

इस पर आपत्ति जताते हुए वीएचपी प्रमुख आलोक कुमार ने कहा कि भले ही आरोपियों के प्रति हमारी कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन बार एसोसिएशन का यह प्रस्ताव देश के संवैधानिक सिद्धांतों और वकीलों की व्यावसायिक नियमावली का सीधा उल्लंघन करता है।

आलोक कुमार ने याद दिलाया सुप्रीम कोर्ट का ‘मोहम्मद रफी’ केस

वीएचपी प्रमुख ने अपने पोस्ट में वर्ष 2011 के ऐतिहासिक ‘ए. एस. मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु राज्य’ मामले का हवाला दिया। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने विस्तार से इस बात पर विचार किया था कि क्या कोई बार एसोसिएशन किसी आरोपी का केस लड़ने से अपने सदस्यों को रोक सकती है?

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी:

“हमारी राय में, ऐसे प्रस्ताव पूरी तरह से गैर-कानूनी हैं, बार की महान परंपराओं और पेशेवर नैतिकता के खिलाफ हैं। समाज किसी व्यक्ति को कितना भी दुष्ट, पतित, नीच, क्रूर या घृणित क्यों न मानता हो, उसे अदालत में अपना बचाव करने का पूरा अधिकार है। उसी के अनुरूप, वकील का यह पवित्र कर्तव्य है कि वह उसका बचाव करे।”

सुप्रीम कोर्ट ने उस समय देश के सभी हाई कोर्ट और डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशनों को सचेत किया था कि चाहे मामला आतंकवाद का हो, बलात्कार का हो या किसी जघन्य अपराध का, किसी भी व्यक्ति को उसके कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

संविधान का अनुच्छेद 21 और बार काउंसिल के नियम

आलोक कुमार ने वकीलों को भारत के संविधान और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के नियमों का पाठ पढ़ाते हुए दो मुख्य बातें सामने रखीं:

  • अनुच्छेद 21 (Right to Defense): भारतीय संविधान के अनुसार, गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी पसंद के वकील से सलाह लेने और अदालत में अपना बचाव करने के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

  • बार काउंसिल का नियम (Chapter II): इसके तहत यदि कोई मुवक्किल (Client) वकील की निर्धारित फीस देने को तैयार है और वकील किसी अन्य केस में व्यस्त नहीं है, तो वह केस लेने से इनकार नहीं कर सकता। किसी भी संगठन द्वारा सामूहिक रूप से किसी आरोपी का बहिष्कार करना कानूनन अपराध है।

“दोषियों को 4-5 महीने के भीतर मिले जेल, लेकिन तरीका कानूनी हो”

वीएचपी प्रमुख ने साफ किया कि राम जन्मभूमि जैसी पवित्र जगह पर चोरी करने वालों के लिए उनके मन में रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं है। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले की जांच बेहद तेजी से पूरी की जाए और केस को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में चलाकर आगामी 4 से 5 महीनों के भीतर दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देकर जेल भेजा जाए।

हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि सजा दिलाने के चक्कर में हम देश के कानून, नैतिकता और स्थापित अदालती नियमों को ताक पर नहीं रख सकते। उन्हें पूरी उम्मीद है कि अयोध्या बार एसोसिएशन कानून का सम्मान करते हुए अपने इस अव्यवहारिक फैसले को तुरंत वापस लेगा।

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