19 मार्च से शुरू होगा विक्रम संवत 2083, इस बार 13 महीनों का होगा साल; जानें चैत्र नवरात्रि मुहूर्त और अधिकमास का खास महत्व…

धार्मिक डेस्क : भारतीय काल गणना और सनातन परंपरा के अनुसार, इस वर्ष चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व के साथ ही हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत 2083 का भव्य आगाज़ होने जा रहा है। 19 मार्च 2026 से शुरू होने वाला यह नव संवत्सर बेहद खास और दुर्लभ संयोग लेकर आ रहा है। ज्योतिषीय गणनाओं के मुताबिक, इस साल हिंदू वर्ष 12 नहीं बल्कि पूरे 13 महीनों का होने वाला है। ज्येष्ठ मास में ‘अधिकमास’ (पुरुषोत्तम मास) के जुड़ने से काल चक्र में यह विशेष बदलाव देखने को मिलेगा। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि की तिथियां, घटस्थापना का सटीक समय और इस साल के अधिपति देवों की महिमा।

चैत्र नवरात्रि और घटस्थापना: 19 मार्च से शक्ति की साधना

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन यानी प्रतिपदा तिथि को ही घटस्थापना के साथ मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना शुरू होगी। 19 मार्च को सुबह के शुभ मुहूर्त में भक्त अपने घरों और मंदिरों में कलश स्थापित करेंगे। इस दिन मां शैलपुत्री की पूजा से नौ दिवसीय उत्सव की शुरुआत होगी। विद्वानों का मत है कि इस बार उत्तराभाद्रपद नक्षत्र और विशिष्ट योगों के कारण नवरात्रि की पूजा भक्तों के लिए विशेष फलदायी सिद्ध होगी। मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा विधि और उनके प्रिय भोग अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

संवत 2083 में 13 महीने: ज्येष्ठ में आएगा अधिकमास

विक्रम संवत 2083 की सबसे बड़ी विशेषता इसका 13 महीनों का होना है। खगोलीय और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब एक सूर्य संक्रांति के भीतर दो चंद्रमास पूर्ण होते हैं, तो उसे अधिकमास कहा जाता है। इस वर्ष ज्येष्ठ का महीना दो बार आएगा, जिसे ‘ज्येष्ठ अधिकमास’ कहा जाएगा। इसके चलते सावन, भाद्रपद और अन्य त्योहारों की तिथियों में भी बदलाव देखने को मिलेगा। सनातन धर्म में अधिकमास को बेहद पवित्र माना गया है, क्योंकि यह समय आत्मिक शुद्धि और ईश्वर भक्ति के लिए समर्पित होता है।

पुरुषोत्तम मास और भगवान विष्णु की विशेष कृपा

अधिकमास को ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसके स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस महीने में किए गए दान, जप और तप का फल सामान्य दिनों की तुलना में अनंत गुना अधिक मिलता है। विशेषकर भगवान विष्णु की पूजा, श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ और भागवत कथा श्रवण करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस पावन काल में मांगलिक कार्य जैसे विवाह या गृह प्रवेश वर्जित होते हैं, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह समय स्वर्ण काल माना जाता है।

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