नई दिल्ली/दुबई: पश्चिम एशिया (West Asia) के समीकरण अब पूरी तरह बदल चुके हैं। कभी सुरक्षा के लिए अमेरिका के भरोसे रहने वाले खाड़ी देश (Gulf Countries) अब ‘अंकल सैम’ को आंखें दिखा रहे हैं। ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी भीषण जंग ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे संपन्न देशों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अमेरिकी मिलिट्री बेस उनकी सुरक्षा कर रहे हैं या उन्हें खतरे में डाल रहे हैं।
“अब बोझ बन गए हैं अमेरिकी सैन्य ठिकाने”
UAE के दिग्गज राजनीतिक विश्लेषक और मशहूर कमेंटेटर अब्दुलखालिक अब्दुल्ला के ताजा बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। अब्दुल्ला ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अब अमीरात को अपनी धरती पर अमेरिकी सैनिकों की कोई जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक, जो अमेरिकी बेस कभी रणनीतिक मजबूती माने जाते थे, वे अब देश के लिए ‘बोझ’ बन चुके हैं। उन्होंने सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया मंचों पर यह साफ कर दिया है कि समय आ गया है जब US मिलिट्री बेस को बंद करने पर गंभीरता से विचार किया जाए।
ईरानी हमलों ने खोली अमेरिका की पोल?
दरअसल, 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान-इजरायल युद्ध की आग ने UAE, सऊदी अरब और कतर जैसे देशों को झुलसा दिया है। ईरान ने खाड़ी देशों के तेल और गैस ठिकानों पर ताबड़तोड़ मिसाइलें और ड्रोन बरसाए। ताज्जुब की बात यह रही कि इतनी बड़ी संख्या में अमेरिकी सेना की मौजूदगी के बावजूद ये हमले नहीं रुक पाए। खाड़ी देशों का सबसे बड़ा दर्द यह है कि अमेरिका ने ईरान पर जवाबी कार्रवाई करने से पहले सहयोगियों को भरोसे में लेना भी जरूरी नहीं समझा, जिसका खामियाजा इन देशों को आर्थिक और जान-माल के नुकसान के रूप में भुगतना पड़ा।
UAE का नया नारा: “हम खुद अपनी रक्षा करने में सक्षम”
अब्दुलखालिक अब्दुल्ला ने एक्स (X) पर अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा कि हालिया युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि UAE अब बच्चा नहीं रहा। उन्होंने गर्व से कहा, “UAE को अपनी रक्षा के लिए अब अमेरिका के सहारे की जरूरत नहीं है। ईरानी आक्रामकता के दौरान हमारी सेना ने दिखा दिया कि वह खुद का बचाव करने में पूरी तरह सक्षम है।” अब अमीरात की प्राथमिकता अपनी खुद की मिलिट्री को ग्लोबल लेवल पर और अधिक एडवांस बनाने की है, न कि विदेशी सेना की मेजबानी करने की।
क्यों टूट रहा है खाड़ी देशों का भरोसा?
रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों में अमेरिका के खिलाफ गुस्सा अचानक नहीं बढ़ा है। युद्ध के दौरान अमेरिका का ‘कम्युनिकेशन गैप’ और ईरान के हमलों को रोकने में नाकामी ने पुराने समझौतों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। UAE को अब लगता है कि अमेरिकी बेस की मौजूदगी उसे ईरान के निशाने पर और आसानी से ले आती है। अगर भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ा, तो ये मिलिट्री बेस सुरक्षा देने के बजाय संघर्ष का केंद्र बन सकते हैं।
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