पश्चिम बंगाल की राजनीति और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी भीषण बगावत का मामला अब देश के सर्वोच्च निर्वाचन निकाय यानी चुनाव आयोग (Election Commission) के दरवाजे पर पहुंच गया है। पार्टी के नाम और मशहूर चुनाव चिह्न (Symbol) पर कब्जे को लेकर दोनों गुटों के बीच जारी कड़े कूटनीतिक गतिरोध के बीच, बागी ऋतब्रत बनर्जी का गुट गुरुवार दोपहर दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात कर अपना आधिकारिक दावा पेश करने जा रहा है। दूसरी ओर, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े ने भी बगावत को कुचलने के लिए आयोग के सामने अपनी मजबूत किलेबंदी कर दी है।
चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को बुलाने पर क्या कहा?
तृणमूल कांग्रेस द्वारा हाल ही में अपने पदाधिकारियों और राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्यों की एक नई कड़े कूटनीतिक सूची निर्वाचन आयोग को सौंपी गई थी। इसके तुरंत बाद बागी विधायकों ने आयोग के शीर्ष अधिकारियों से मिलकर खुद को ‘असली तृणमूल’ के रूप में मान्यता देने की मांग उठाई है।
इस कदम को विफल करने के लिए ममता बनर्जी खेमे ने आयोग के सामने स्पष्ट किया है कि ममता बनर्जी ही पार्टी की सर्वोच्च और चुनी हुई अध्यक्ष हैं तथा पार्टी का मूल संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह सक्रिय है। इस बीच, दोनों गुटों को आमने-सामने बुलाने या सुनवाई करने के मुद्दे पर निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। दोनों ही गुटों को आयोग की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक सूचना या नोटिस नहीं भेजा गया है।”
बागी गुट का दावा: अरूप रॉय बने नए अध्यक्ष, पैदा हुआ ‘संवैधानिक संकट’
बगावत की आग तब और भड़क गई जब ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने कोलकाता में एक विशेष अधिवेशन आयोजित कर वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया। साथ ही एक समानांतर संगठनात्मक ढांचे (Parallel Organization) का भी ऐलान कर दिया। इसे ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के कड़े नेतृत्व को सीधी चुनौती माना जा रहा है।
बागी गुट का कड़ा तर्क है कि फरवरी 2022 में गठित की गई पिछली राष्ट्रीय कार्यसमिति का कानूनी कार्यकाल समाप्त हो चुका है, जिसके कारण पार्टी में एक गहरा ‘संवैधानिक संकट’ पैदा हो गया था और यह कदम उठाना बेहद जरूरी था।
ममता खेमे का पलटवार: ‘असंतुष्टों के पास कोई वैधता नहीं’
ममता बनर्जी गुट ने बागियों की इस पूरी कवायद और अधिवेशन को सिरे से खारिज कर दिया है।
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कुणाल घोष (TMC नेता): “बागी नेताओं को इस तरह का कोई भी अधिवेशन बुलाने या पार्टी के मूल संगठनात्मक ढांचे में मनमाना बदलाव करने का कोई कानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है।”
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विधायकों का समर्थन: जहां बागी गुट का दावा है कि उनके पास सांसदों और विधायकों के एक बहुत बड़े वर्ग का समर्थन प्राप्त है, वहीं ममता बनर्जी खेमे का साफ कहना है कि असंतुष्ट नेताओं के पास कोई संगठनात्मक और कानूनी वैधता (Legitimacy) नहीं है।
गुरुवार को मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलेगी बागियों की फौज
पार्टी में मचे इस कड़े घमासान के बीच, बंगाल में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बागी समूह का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से मुलाकात करेगा।
ऋतब्रत बनर्जी गुट ने भी अपनी एक अलग 30 सदस्यों वाली समानांतर राष्ट्रीय कार्य समिति का गठन कर लिया है। बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि इस नई समिति में फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास और रथिन घोष जैसे तृणमूल के वे दिग्गज और वरिष्ठ नेता शामिल हैं, जिन्हें कभी ममता बनर्जी का सबसे कट्टर और भरोसेमंद सिपहसालार माना जाता था। अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग इस कड़े राजनीतिक विवाद पर क्या कानूनी रुख अपनाता है।
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