वॉशिंगटन/यरूशलेम: मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है और दुनिया एक बड़े महायुद्ध की गवाह बन रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ईरान पर हमले का यह खौफनाक प्लान दशकों पुराना है? इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू इस ‘वॉर प्लान’ को लेकर सालों से अमेरिका के चक्कर काट रहे थे। हाल ही में हुए खुलासों ने चौंका दिया है कि जिस योजना को तीन पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने सिरे से खारिज कर दिया था, उसे डोनाल्ड ट्रंप ने न केवल मंजूरी दी, बल्कि ईरान के साथ सीधी जंग का रिस्क भी मोल ले लिया।
जॉन केरी का बड़ा खुलासा: बुश, ओबामा और बाइडेन ने किया था इनकार
अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने एक टीवी शो ‘द लेट शो विद स्टीफन कोलबर्ट’ में सनसनीखेज दावा किया है। केरी के मुताबिक, नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु ठिकानों को तबाह करने और वहां सत्ता परिवर्तन (Regime Change) का प्रस्ताव जॉर्ज डब्ल्यू बुश, बराक ओबामा और जो बाइडेन के सामने रखा था।
जॉन केरी ने कहा, “मैं खुद उन वार्ताओं का हिस्सा रहा हूँ। ओबामा, बुश और बाइडेन तीनों ने ही इस प्लान को ठुकरा दिया था। वियतनाम और इराक युद्ध के कड़वे अनुभवों ने उन्हें सिखाया था कि झूठ बोलकर देश के बच्चों को जंग के मैदान में झोंकना सही नहीं है।”
ट्रंप ने क्यों बदला दशकों पुराना फैसला?
जहाँ पिछले राष्ट्रपतियों ने कूटनीति और समझौतों का रास्ता चुना, वहीं ट्रंप ने इजरायल के सुर में सुर मिलाया। इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण माने जा रहे हैं:
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परमाणु समझौते (JCPOA) से बाहर निकलना: केरी का दावा है कि जैसे ही ट्रंप प्रशासन 2015 के परमाणु समझौते से पीछे हटा, ईरान के साथ युद्ध “लगभग तय” हो गया था। इससे ईरान के पास समझौते की गुंजाइश खत्म हो गई।
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सत्ता परिवर्तन का ‘आसान’ सपना: 11 फरवरी को वाइट हाउस में हुई एक गुप्त बैठक में नेतन्याहू ने ट्रंप को भरोसा दिलाया कि ईरान में सत्ता परिवर्तन करना बेहद आसान है और अमेरिका-इजरायल मिलकर यह कर सकते हैं। ट्रंप ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।
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नेतन्याहू का अटूट भरोसा: नेतन्याहू 1990 के दशक से दावा कर रहे हैं कि ईरान हफ्तों के भीतर परमाणु बम बना लेगा। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय एजेंसी IAEA को अब तक इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला है, लेकिन ट्रंप ने नेतन्याहू के आकलन को सही माना।
जेडी वेंस की चेतावनी और प्रशासन में मतभेद
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के भीतर भी इस युद्ध को लेकर एक राय नहीं थी। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने नेतन्याहू के उस दावे पर सवाल उठाए थे, जिसमें उन्होंने ईरान में सत्ता परिवर्तन को ‘बेहद आसान’ बताया था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि नेतन्याहू ने युद्ध की विभीषिका को कम करके आंका, जिसका नतीजा आज पूरे पश्चिम एशिया में फैली अशांति के रूप में दिख रहा है।
क्या अब फिर होगी मिसाइलों की बौछार?
फिलहाल हालात ऐसे हैं कि इजरायल और ईरान के बीच तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिशें फेल होने के बाद अब नजरें चीन पर टिकी हैं। लेकिन सवाल वही है—क्या नेतन्याहू का यह ‘वॉर प्लान’ मध्य पूर्व को कभी न खत्म होने वाली तबाही की ओर ले जाएगा?
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