तमिलनाडु की सियासत में आए हालिया बदलावों ने दिल्ली के सत्ता गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और DMK के बीच दशकों पुरानी दोस्ती टूटने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस स्थिति को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में जुट गई है। सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या DMK, केंद्र की सत्ता में BJP के लिए ‘सॉफ्ट सपोर्टर’ की भूमिका निभा सकती है, जैसा कि अतीत में BJD, YSRCP और BRS जैसी पार्टियां करती रही हैं।
DMK-कांग्रेस की तल्खी और BJP की रणनीति
DMK ने हाल ही में कांग्रेस को ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला’ करार दिया है। इस कड़वाहट का आलम यह है कि DMK ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर संसद में बैठने की व्यवस्था बदलने की मांग की है, ताकि उसके सांसद कांग्रेस के साथ न बैठें। BJP के रणनीतिकारों को लगता है कि यह सही समय है जब DMK को कुछ मुद्दों पर केंद्र के साथ सहयोग के लिए राजी किया जा सकता है। याद रहे कि DMK पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार का हिस्सा रह चुकी है।
क्या आंकड़े बन सकते हैं दोस्ती की वजह?
BJP की इस दिलचस्पी के पीछे एक बड़ा कारण संसद में गणित का खेल है। हाल ही में परिसीमन बिल का लोकसभा में गिरना सरकार के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि वह दो-तिहाई बहुमत से 54 वोट पीछे रह गई थी। ऐसे में BJP को किसी ऐसे साथी की तलाश है जो NDA का औपचारिक हिस्सा न होते हुए भी मुद्दों पर सरकार का समर्थन कर सके। लोकसभा में 22 सांसदों वाली DMK अगर साथ आती है, तो सरकार के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करना बेहद आसान हो जाएगा।
राह में खड़े हैं दो बड़े ‘राजनीतिक रोड़े’
DMK और BJP की इस संभावित नजदीकी के रास्ते में दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं, जिन्हें पार करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है:
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परिसीमन और भाषा विवाद: DMK ने अपने पूरे चुनाव अभियान को ‘परिसीमन योजना’ के विरोध पर केंद्रित रखा था। उनका आरोप है कि यह दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को कम करने का ‘BJP का हमला’ है। इसके अलावा, त्रिभाषा फॉर्मूले पर DMK का सख्त रुख है, जिस पर समझौता करना MK स्टालिन के लिए राजनीतिक आत्महत्या जैसा हो सकता है।
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सनातन धर्म का मुद्दा: दूसरा सबसे बड़ा रोड़ा ‘सनातन धर्म’ को लेकर DMK का स्टैंड है। पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन पर दिए गए विवादास्पद बयान और उसे खत्म करने की मांग ने BJP और DMK के बीच वैचारिक खाई को बहुत गहरा कर दिया है।
भविष्य का सियासी गणित
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राज्य और केंद्र, दोनों जगह विपक्ष में रहना किसी भी क्षेत्रीय पार्टी के लिए कठिन होता है। TVK के हाथों हार और कांग्रेस से दूरी के बाद DMK अपनी राजनीतिक जमीन को फिर से मजबूत करने की कोशिश करेगी। हालांकि, स्टालिन के लिए अपने वैचारिक आधार (परिसीमन और सनातन विरोध) को छोड़कर BJP के साथ खड़ा होना आसान नहीं होगा। क्या स्टालिन अपनी रणनीति बदलकर केंद्र के साथ ‘मुद्दे आधारित सहयोग’ करेंगे, या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी सियासी कयास है? आने वाले सत्रों में संसद की बैठक व्यवस्था और वोटिंग पैटर्न ही इस सवाल का जवाब देंगे।
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