
देश के चुनावी नक्शे को बदलने वाले सबसे संवेदनशील मुद्दे यानी परिसीमन (Delimitation) को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सियासी टकराव अब चरम पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार द्वारा परिसीमन विधेयक को संसद के पटल पर दोबारा लाए जाने की चर्चाओं के बीच मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपने पत्ते पूरी तरह खोल दिए हैं। कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को खुली चेतावनी दी है कि यदि उसने आम सहमति के बिना इस बिल को दोबारा पारित कराने की जिद दिखाई, तो उसे संसद के पटल पर एक बार फिर शर्मनाक हार का सामना करना पड़ेगा। इस तीखे बयान ने साफ कर दिया है कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह लामबंद है और किसी भी सूरत में अपने रुख से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
किरण रिजिजू के पत्र पर जयराम रमेश का पलटवार: ‘सरकार आम सहमति नहीं, टकराव चाहती है’
यह पूरा सियासी घमासान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को लिखे गए पत्र के बाद और ज्यादा भड़क गया। सरकार का आरोप था कि परिसीमन को लेकर बुलाई गई सर्वदलीय चर्चाओं में कांग्रेस ने जानबूझकर तारीखें नहीं दीं और सहयोग नहीं किया, जिसके बाद सरकार ने अन्य क्षेत्रीय दलों से बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इस पर कांग्रेस ने जोरदार पलटवार करते हुए कहा कि सरकार बातचीत का दिखावा कर रही है, जबकि उसकी मंशा पिछले दरवाजे से राज्यों के अधिकारों पर चोट करने की है। जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 81 और परिसीमन की मूल भावना को दरकिनार करके उठाया गया कोई भी एकतरफा कदम देश के संघीय ढांचे के खिलाफ है। कांग्रेस ने दावा किया कि संख्याबल और सदन के गणित में सरकार की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही है, इसलिए सदन के भीतर विपक्षी एकता इस विधेयक को किसी भी हाल में पास नहीं होने देगी।
दक्षिण बनाम उत्तर: लोकसभा सीटों की संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व पर गहराता विवाद
परिसीमन के इस पूरे विवाद की जड़ में उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का असंतुलन सबसे बड़ा पेच बना हुआ है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन की राष्ट्रीय नीतियों का कड़ाई से पालन किया है। इन राज्यों और कांग्रेस का मुख्य तर्क यह है कि यदि केवल नई जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण किया गया, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या रोकी है उन्हें संसद में कम सीटें मिलेंगी और उनकी राजनीतिक ताकत घट जाएगी। वहीं दूसरी तरफ, उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं का स्पष्ट कहना है कि बिना पारदर्शी जनगणना, जातिगत सर्वे और राज्यों के अधिकारों की पुख्ता गारंटी के बिना किसी भी तरह का परिसीमन देश के संघीय ढांचे पर सीधा हमला होगा।
संसद से सड़क तक बड़े सियासी टकराव की ओर बढ़ रहा देश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों और भविष्य की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाला सबसे बड़ा ध्रुवीकरण बिंदु साबित हो सकता है। सरकार जहां इसे समान प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी संवैधानिक प्रक्रिया बता रही है, वहीं विपक्ष इसे क्षेत्रीय संतुलन बिगाड़ने और चुनावी नक्शे में मनमाफिक फेरबदल का औजार करार दे रहा है। कांग्रेस द्वारा सरकार को ‘हार का मुंह देखने’ की सीधी चेतावनी दिए जाने के बाद अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार संसद का विशेष सत्र बुलाकर इस विधेयक को आगे बढ़ाएगी या फिर विपक्षी दलों के कड़े रुख के आगे बैकफुट पर जाने को मजबूर होगी। आने वाले दिनों में यह टकराव संसद के गलियारों से निकलकर सड़क के बड़े आंदोलन में तब्दील हो सकता है।
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