
देशभर में जहां एक तरफ विजयदशमी के पावन पर्व पर बुराई के प्रतीक के रूप में लंकापति रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के ऊंचे-ऊंचे पुतले फूंके जाते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर मथुरा में इस परंपरा से हटकर एक अनोखी तस्वीर देखने को मिली। हर साल की तरह इस बार भी विजयादशमी के मौके पर मथुरा में लंकेश भक्त मंडल के कार्यकर्ताओं ने रावण का पुतला फूंकने के बजाय उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की, आरती उतारी और उसके विद्वान स्वरूप को याद किया। इस अनोखे आयोजन ने एक बार फिर से समाज और देश भर के लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, जहां रावण को खलनायक की बजाय महान विद्वान और शिव भक्त के रूप में सम्मानित किया जाता है।
मथुरा में आयोजित इस विशेष पूजा-अर्चना के दौरान लंकेश भक्त मंडल के प्रमुख सदस्यों और पदाधिकारियों ने मीडिया से बातचीत करते हुए एक बेहद चौंकाने वाला और तार्किक दावा पेश किया। संगठन के कार्यकर्ताओं का कहना है कि हमारे किसी भी प्राचीन सनातन ग्रंथ, वेद या शास्त्र में लंकापति रावण के पुतले को आग के हवाले करने या जलाने जैसी किसी भी परंपरा का कोई उल्लेख या जिक्र नहीं मिलता है। उनका तर्क है कि रावण वेदों के ज्ञाता, महान प्रकांड पंडित, ज्योतिष आचार्य और भगवान शिव के परम भक्त थे। ऐसे में किसी भी ज्ञानी और विद्वान व्यक्ति का पुतला बनाकर उसे सार्वजनिक रूप से आग लगाना हमारी संस्कृति और शास्त्रों के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत है।
मथुरा के इस कार्यक्रम में जुटे लोगों ने रावण के नकारात्मक पक्षों के अलावा उनके प्रकांड विद्वान होने के पहलुओं पर भी गहरी चर्चा की। उपस्थित वक्ताओं और विद्वानों का कहना था कि रावण ने अपने जीवन में भले ही सीता हरण जैसा गलत कृत्य किया हो जिसके कारण उनका वध हुआ, लेकिन इसके साथ ही वे दक्षिण भारत के एक महान राजा थे जिन्हें शासन कला, संगीत, तंत्र और आयुर्वेद का अगाध ज्ञान था। लंकेश भक्तों का मानना है कि रावण दहन की मौजूदा आधुनिक परंपरा सदियों पुरानी नहीं है, बल्कि यह समय के साथ समाज में शुरू हुई एक प्रतीकात्मक प्रथा मात्र है, जबकि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने भी रावण वध के पश्चात उनके भाई विभीषण को उनका पूरे विधि-विधान और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने का आदेश दिया था।
मथुरा में पिछले कई वर्षों से लंकेश भक्त मंडल द्वारा विजयादशमी के दिन इस तरह के आयोजनों को बेहद शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से किया जा रहा है। हालांकि इस आयोजन को लेकर कई बार स्थानीय स्तर पर धार्मिक संगठनों और आम जनता के बीच वैचारिक बहस भी छिड़ जाती है, लेकिन आयोजकों का साफ कहना है कि उनका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेસ पहुंचाना नहीं है, बल्कि रावण के अंदर मौजूद विद्वत्ता और अहंकार से दूर रहने की सीख को समाज के सामने रखना है। इस पूजा के दौरान रावण की मूर्ति या तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर उनकी बुद्धि और ज्ञान की प्रशंसा की जाती है, साथ ही यह संदेश दिया जाता है कि इंसान को अपने भीतर के अहंकार रूपी रावण का दहन करना चाहिए, न कि किसी पुतले को जलाना चाहिए।
जैसे ही मथुरा में रावण की पूजा और लंकेश मंडल के इस बयान की खबरें सोशल मीडिया और स्थानीय समाचार चैनलों के माध्यम से बाहर आईं, वैसे ही इस पर बहस छिड़ गई। एक तरफ जहां पारंपरिक सनातनी विचारधारा के लोग पुतला दहन को असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की शाश्वत विजय का प्रतीक मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ इतिहासकार और बुद्धिजीवी इस बात से सहमत दिखते हैं कि रावण के विद्वान स्वरूप को पूरी तरह नकारना उचित नहीं है। मथुरा के इस अनूठे आयोजन ने एक बार फिर से इस बात पर सोचने को मजबूर कर दिया है कि हमारी पौराणिक कथाओं और उनके मंचन व परंपराओं को आधुनिक दौर में किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, मथुरा में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का प्रतीक है कि हमारी संस्कृति में विविधता और अलग-अलग विचारों के लिए कितना स्थान है। जहां एक ओर पूरा देश आतिशबाजी और विशालकाय पुतलों के दहन के साथ विजयदशमी का जश्न मनाता है, वहीं मथुरा के एक छोटे से कोने में रावण के ज्ञान और उसकी कमजोरियों से सीख लेने का यह प्रयास अपने आप में अनूठा है। यह आयोजन लोगों को यह सोचने पर विवश करता है कि हर कथा के कई पहलू हो सकते हैं और हमें बुराई के पुतले के साथ-साथ अपने भीतर की बुराइयों को खत्म करने पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए, तभी इस पावन पर्व का असली उद्देश्य पूरा हो सकता है।
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