
सनातन परंपरा में संतान के दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन की मंगलकामना के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत आज पूरे श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ रखा जा रहा है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाला यह पावन पर्व माताओं के त्याग और अटूट वात्सल्य का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। जितिया को हिंदू धर्म के सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि इसमें माताएं पूरे 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना अन्न और जल की एक भी बूंद ग्रहण किए अत्यंत कठोर ‘निर्जला उपवास’ रखती हैं। उत्तर भारत, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में इस पर्व का उल्लास देखते ही बनता है। सुबह से ही घरों में पूजा की तैयारियां चल रही हैं और माताएं अपनी संतानों के कल्याण के लिए अखंड साधना में लीन हैं।
जितिया व्रत की महिमा: संतान पर आए हर बड़े संकट को टालता है यह उपवास
जीवित्पुत्रिका व्रत का धार्मिक और पौराणिक महत्व असीम माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि जो माताएं पूरी निष्ठा, पवित्रता और विधि-विधान के साथ इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान करती हैं, उनकी संतानों पर काल का साया भी नहीं पड़ता। यह व्रत संतान को अकाल मृत्यु, गंभीर बीमारियों और जीवन में आने वाली अप्रत्याशित बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करता है। संतानहीन दंपतियों को इस व्रत के पुण्य प्रभाव से सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है, वहीं जिनकी संतान पहले से है, उनके मान-सम्मान, बुद्धि और यश में निरंतर वृद्धि होती है। इस दिन माताएं भगवान जीमूतवाहन, कुलदेवी और भगवान सूर्य की उपासना कर अपनी संतानों के लिए सुरक्षा का एक अभेद्य आध्यात्मिक कवच मांगती हैं।
आज कैसे की जाती है जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा विधि
आज अष्टमी तिथि पर माताएं दिनभर निर्जला उपवास रखते हुए सायंकाल के समय विशेष पूजा-अर्चना करती हैं। जितिया की पूजा का विधान बेहद अनूठा और प्रकृति से जुड़ा हुआ है:
-
घर के आंगन या स्वच्छ स्थान पर गोबर या पवित्र मिट्टी से लीपकर एक छोटा सा प्रतीकात्मक जलाशय (तालाब) बनाया जाता है।
-
जलाशय के किनारे पाकड़ या बरगद की एक हरी डाल स्थापित की जाती है।
-
कुश (घास) से गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाई जाती है और उन्हें जलाशय के समीप स्थापित किया जाता है।
-
इसके साथ ही मिट्टी या गोबर से चील्ह (चील) और सियारिन (लोमड़ी) की मूर्तियां बनाई जाती हैं और उन पर सिंदूर का टीका लगाया जाता है।
-
पूजा में सरसों का तेल, खली, नोनी का साग, मरुवा का आटा, बांस के पत्ते, तोरी (झिंगी) के फूल और खीरा विशेष रूप से अर्पित किए जाते हैं।
-
सभी व्रती महिलाएं एक साथ बैठकर राजा जीमूतवाहन, चील्ह-सियारिन की पौराणिक कथा और महाभारत कालीन प्रसंगों का श्रवण करती हैं और रातभर भजन-कीर्तन करती हैं।
कल कब और किस समय होगा जितिया व्रत का पारण
जितिया व्रत के नियम अत्यंत कड़े होते हैं और इसका समापन यानी पारण नवमी तिथि के आगमन पर सूर्योदय के बाद ही किया जाता है। अष्टमी तिथि की समाप्ति और नवमी तिथि के प्रवेश के बाद ही व्रती महिलाएं अन्न-जल ग्रहण कर सकती हैं।
-
पारण की तिथि: कल, आश्विन कृष्ण नवमी तिथि (रविवार)।
-
पारण का शुभ समय: कल प्रातः सूर्योदय के तुरंत बाद, लगभग सुबह 06:15 बजे से लेकर 08:30 बजे तक का समय पारण के लिए सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
-
पारण का विशेष नियम: जितिया व्रत का पारण करने से पहले प्रातःकाल पुनः स्नान कर सूर्यदेव को जल का अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद पूजा में चढ़ाई गई सामग्री से ही व्रत खोला जाता है।
-
पारण में क्या खाएं: परंपरा के अनुसार सबसे पहले नोनी का साग, मरुवा की रोटी, कंदा या तोरी की सब्जी और खीरा खाकर ही व्रत खोला जाता है। साथ ही लाल धागा (जितिया डोरा), जिसे पूजा में भगवान जीमूतवाहन को अर्पित किया गया था, उसे संतान के गले में रक्षा सूत्र के रूप में पहनाया जाता है।
भगवान जीमूतवाहन और महाभारत काल से जुड़ी अद्भुत मान्यताएं
जितिया व्रत के पीछे दो मुख्य पौराणिक मान्यताएं जनमानस में गहराई से रची-बसी हैं। पहली कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की है, जिन्होंने पक्षीराज गरुड़ से शंखचूड़ नाम के नाग के प्राण बचाने के लिए स्वयं अपने शरीर का बलिदान दे दिया था। जीमूतवाहन के इस अप्रतिम त्याग और परोपकार को देखकर गरुड़ देव ने न केवल उन्हें जीवनदान दिया, बल्कि सभी नागों को अभयदान भी दिया। इसी कारण भगवान जीमूतवाहन को संतानों का परम रक्षक माना गया।
दूसरी मान्यता महाभारत के भीषण युद्ध से संबंधित है। जब कौरवों के सेनापति अश्वत्थामा ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर पर हमला कर द्रोपदी के पांचों पुत्रों को मार डाला और उसके बाद उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु पर ब्रह्मास्त्र चला दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने समस्त सुदर्शन चक्र के तेज और पुण्यों से उत्तरा के मृत गर्भ को पुनः जीवन दिया था। गर्भ में दोबारा जीवन पाने वाले वही बालक आगे चलकर चक्रवर्ती राजा परीक्षित कहलाए। तभी से भगवान श्रीकृष्ण के इस वरदान के उपलक्ष्य में संतान के प्राणों की रक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा अनवरत चली आ रही है।
जितिया व्रत के दिन इन खास बातों और नियमों का रखें ध्यान
जितिया व्रत में मन, वचन और कर्म की पवित्रता का सबसे बड़ा महत्व है। व्रती महिलाओं को आज के दिन किसी पर क्रोध नहीं करना चाहिए और न ही कटु वचनों का प्रयोग करना चाहिए। घर के सभी सदस्यों को पूर्ण सात्विकता बनाए रखनी चाहिए और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पारण करने से पहले ब्राह्मणों, गायों या जरूरतमंदों को भोजन का अंश और सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा अवश्य निकालनी चाहिए। मान्यता है कि जो माताएं इन सभी नियमों का अक्षरशः पालन करते हुए इस कठिन व्रत को पूर्ण करती हैं, उनके बच्चों को दीर्घायु, अटूट यश और हर क्षेत्र में अपार सफलता प्राप्त होती है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया