
पाकिस्तान की डगमगाती सियासत और सेना के बीच जारी खूनी शह-मात का खेल अब अपने सबसे खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत में अचानक आपातकाल और राज्यपाल शासन (Governor’s Rule) थोपे जाने के कुछ ही घंटों के भीतर प्रांतीय सरकार को निलंबित कर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के शीर्ष नेताओं की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां शुरू कर दी गई हैं। खैबर पख्तूनख्वा के कार्यवाहक नेतृत्व, प्रांतीय विधानसभा के स्पीकर बाबर सलीम स्वाती और पीटीआई के प्रांतीय अध्यक्ष जुनैद अकबर समेत दर्जनों प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया गया है। रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (GHQ) के इशारे पर हुए इस अप्रत्याशित तख्तापलट जैसे एक्शन के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि आखिर पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने इमरान खान के सबसे मजबूत राजनीतिक किले KPK को पूरी तरह सील करने की क्या सुनियोजित साजिश रची है।
इस्लामाबाद ‘लॉन्ग मार्च’ का खौफ और सत्ता का खेल
इस पूरे घटनाक्रम की तात्कालिक वजह पीटीआई द्वारा जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई को लेकर निकाला जाने वाला विशाल ‘इस्लामाबाद मार्च’ था। खैबर पख्तूनख्वा से लाखों की तादाद में समर्थक संघीय राजधानी इस्लामाबाद की ओर कूच करने की तैयारी कर रहे थे। सैन्य प्रतिष्ठान और शाहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार को अंदेशा था कि अगर यह जनसैलाब राजधानी पहुंच गया, तो हालात पूरी तरह बेकाबू हो जाएंगे। सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर के दबाव में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने संविधान के विवादास्पद अनुच्छेदों का सहारा लेते हुए रातों-रात आपातकाल लागू कर दिया और प्रांत में सीधे सेना को तैनात कर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आपातकाल का मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि इमरान खान के आखिरी राजनीतिक गढ़ की सत्ता को कानूनी हथकंडों से छीनना था।
आतंकवाद का बहाना और पीटीआई के सफाए का ब्लूप्रिंट
इमरान खान के बेटे कासिम और पीटीआई के कानूनी सलाहकारों ने आरोप लगाया है कि जनरल आसिम मुनीर इस क्षेत्र में सैन्य अभियानों और राजनीतिक दमन को सही ठहराने के लिए ‘आतंकवाद और सुरक्षा संकट’ का सहारा ले रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की बढ़ती सक्रियता को ढाल बनाकर सेना ने पूरे प्रशासनिक तंत्र पर नियंत्रण कर लिया है। पीटीआई की चुनी हुई सरकार को निलंबित करके नौकरशाही में अपने चहेते सैन्य और असैन्य अधिकारियों की तैनाती कर दी गई है। पार्टी के स्थानीय संगठनों, जिला कार्यालयों और फंडिंग के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए व्यापक छापेमारी अभियान चलाया जा रहा है ताकि भविष्य में किसी भी बड़े जनआंदोलन की रीढ़ तोड़ी जा सके।
क्या KPK में भड़क सकता है गृहयुद्ध?
खैबर पख्तूनख्वा की पश्तून आबादी हमेशा से पाकिस्तानी सेना के सीधे दखल के खिलाफ मुखर रही है। पीटीआई की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने और नेताओं को जेल में डालने से स्थानीय जनता में भारी असंतोष और गुस्सा है। पेशावर, लक्की मरवत, स्वात और मरदान जैसे इलाकों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। अटक ब्रिज पर कंटेनरों की दीवारें खड़ी करके खैबर पख्तूनख्वा को पंजाब और इस्लामाबाद से काट दिया गया है। यदि सेना ने बल प्रयोग जारी रखा, तो यह टकराव सीधे तौर पर सुरक्षा बलों और स्थानीय नागरिकों के बीच सशस्त्र संघर्ष का रूप ले सकता है, जिससे पाकिस्तान में गंभीर आंतरिक अस्थिरता और गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा होने का खतरा मंडरा रहा है।
असंवैधानिक कदम के खिलाफ अदालत का दरवाजा
पीटीआई ने इस पूरे कदम को अवैध, असंवैधानिक और दुर्भावना से प्रेरित करार देते हुए उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बिना किसी ठोस संवैधानिक आधार के चुनी हुई प्रांतीय सरकार को भंग करना लोकतंत्र की हत्या है। हालांकि, मौजूदा माहौल में पाकिस्तान की न्यायपालिका पर सैन्य प्रतिष्ठान का गहरा दबाव जगजाहिर है। जनरल आसिम मुनीर ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे इमरान खान के किसी भी राजनीतिक पुनरुत्थान को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, भले ही इसके लिए पाकिस्तान की संवैधानिक व्यवस्था और राष्ट्रीय अखंडता को ही दांव पर क्यों न लगाना पड़े।
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