इजरायल चुनाव में वोट चोरी का भूचाल: बहुमत से चूके नेतन्याहू का मुस्लिम पार्टियों पर धांधली का बड़ा आरोप

इजरायल की राजनीति में इस वक्त 10 की तीव्रता वाला सियासी भूचाल आ चुका है। दशकों से इजरायली सत्ता की धुरी बने रहने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संसद (नेसेट) के आम चुनावों के बाद बेहद विस्फोटक और अप्रत्याशित दावा ठोक दिया है। उनकी दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी का सीधा आरोप है कि इस बार का जनादेश चुराया गया है और इस कथित ‘वोट चोरी’ के पीछे देश की अरब और मुस्लिम पार्टियां हैं। तेल अवीव से लेकर यरुशलम के सत्ता गलियारों तक केवल एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या वाकई इजरायल की अभेद्य मानी जाने वाली लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली में कोई बड़ी सेंधमारी हुई है या फिर यह सिर्फ बहुमत न जुटा पाने की भारी राजनीतिक बेचैनी है?

नेसेट का चुनावी गणित: 61 के जादुई आंकड़े से कैसे फिसले ‘किंग बीबी’?

इजरायल की 120 सीटों वाली संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों के समर्थन की दरकार होती है। चुनाव के ताजा रुझानों और मतगणना के आंकड़ों के मुताबिक बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 26 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर तो उभरी है, लेकिन उनके पारंपरिक दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी गठबंधन का कुल आंकड़ा महज 53 सीटों पर जाकर अटक गया। यानी नेतन्याहू जादुई बहुमत से पूरे 8 कदम दूर रह गए हैं। दूसरी ओर, विपक्षी खेमा भी 48 सीटों के आसपास सिमटा नजर आ रहा है। इस त्रिशंकु विधानसभा जैसे पेच में सबसे बड़ा उलटफेर किया है अरब और मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों ने, जिन्होंने मिलकर अप्रत्याशित रूप से 19 सीटों का बड़ा आंकड़ा अपने नाम कर लिया है।

अरब पार्टियों का ऐतिहासिक प्रदर्शन: कैसे बदल गया किंगमेकर का पूरा समीकरण?

शुरुआती परिणामों के अनुसार अरब मतदाताओं के भारी मतदान के चलते ज्वाइंट लिस्ट को लगभग 12 और मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट (रा’अम) को 7 सीटें मिलती दिख रही हैं। यही 19 सीटें अब इजरायल की अगली हुकूमत तय करने की चाबी बन गई हैं। अगर विपक्षी गुट इन दलों के बाहरी या प्रत्यक्ष समर्थन से सरकार बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो बेंजामिन नेतन्याहू के हाथों से प्रधानमंत्री की कुर्सी हमेशा के लिए फिसल सकती है। इसी सियासी खतरे ने नेतन्याहू कैंप में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी है, जिसके बाद सीधे मुस्लिम और अरब पार्टियों को निशाने पर लिया जाने लगा।

लिकुड का सनसनीखेज डोजियर: लिफाफों में कैश, फर्जी वोटर और बूथों पर धमकी

लिकुड पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए इजरायल पुलिस, सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ और सेंट्रल इलेक्शंस कमेटी (सीईसी) को सैकड़ों गवाहियां और दस्तावेज सौंपने का ऐलान किया है। नेतन्याहू के वफादार नेताओं का दावा है कि अरब बहुल इलाकों, खासकर उत्तरी शहरों और नेगेव के बेडूइन कस्बों में व्यवस्थित तरीके से चुनावी धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। आरोपों में कहा गया है कि मतदान केंद्रों के बाहर रा’अम पार्टी की पर्चियों के साथ नकदी बांटी गई, चुनावी कर्मचारियों को डराया-धमकाया गया और कई जगहों पर एक ही पहचान पत्र पर बार-बार वोट डलवाए गए। इतना ही नहीं, वोटरों को अवैध रूप से लामबंद करने के लिए प्रतिबंधित डिजिटल सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल का आरोप भी मढ़ा गया है।

अरब नेताओं का तीखा पलटवार: ‘हार के डर से बेडूइन और मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने की साजिश’

लिकुड के इन तीखे हमलों पर अरब नेताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों ने बेहद आक्रामक जवाब दिया है। बेडूइन बहुल शहर राहत के मेयर तलाल अल-क्रेनावी ने नेतन्याहू के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे लोकतंत्र पर धब्बा करार दिया। उन्होंने कहा कि इतिहास में पहली बार अरब और बेडूइन समुदाय के बुजुर्ग, महिलाएं और युवा अपनी लाठी के सहारे लंबी कतारों में लगकर अपने नागरिक अधिकार का इस्तेमाल करने पहुंचे थे। उन्होंने दो टूक कहा कि जब तक अरब नागरिक वोट न दें, तब तक ठीक रहता है, लेकिन जैसे ही वे अपने लोकतांत्रिक अधिकार से खेल पलट देते हैं, तो उन्हें ‘चोर’ और ‘धोखेबाज’ बता दिया जाता है। रा’अम पार्टी ने भी कहा कि यह दक्षिणपंथी वोट बैंक को ध्रुवीकृत करने और हार की हताशा छिपाने का घिनौना प्रयास है।

सुरक्षा एजेंसियों और चुनाव आयोग का रुख: क्या होगी निष्पक्ष जांच?

इजरायल की सेंट्रल इलेक्शंस कमेटी (सीईसी) ने स्पष्ट किया है कि चुनावों के बाद हर दल को मतदान केंद्रों पर किसी भी विसंगति की शिकायत दर्ज कराने का वैधानिक अधिकार होता है। चुनाव आयोग ने लिकुड द्वारा दी गई शिकायतों को अपनी नियमित मॉनिटरिंग प्रक्रिया के तहत जांचना शुरू कर दिया है। हालांकि, स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि इक्का-दुक्का तकनीकी गड़बड़ियों या स्थानीय विवादों को पूरे चुनाव का ‘सिस्टमेटिक फ्रॉड’ करार देना इजरायल की चुनावी विश्वसनीयता पर गंभीर चोट पहुंचा सकता है। शिन बेट और पुलिस भी आरोपों की जमीनी हकीकत परख रही है, लेकिन बिना पुख्ता अदालती सबूतों के चुनावी नतीजों को खारिज करना लगभग नामुमकिन है।

इजरायल का सियासी भविष्य: क्या फिर से चुनाव की ओर बढ़ रहा है देश?

अगर चुनाव आयोग ने इन नतीजों पर अंतिम मुहर लगा दी, तो बेंजामिन नेतन्याहू के सामने दो ही रास्ते बचेंगे—या तो वे किसी तरह विपक्षी गुट में सेंधमारी कर 8 सांसदों को अपने पाले में लाएं, या फिर इजरायल एक बार फिर नई राजनीतिक अस्थिरता और दोबारा चुनाव के दलदल में धकेल दिया जाएगा। अरब पार्टियों के 19 सांसदों के समर्थन के बिना न तो विपक्ष आसानी से 61 का आंकड़ा छू सकता है और न ही नेतन्याहू सरकार बचा सकते हैं। आने वाले कुछ दिन इजरायल के इतिहास में बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं, जहां फैसला सिर्फ सरकार का नहीं, बल्कि मुल्क के लोकतांत्रिक ढांचे और सामाजिक सौहार्द का भी होगा।

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