एसएसपी दफ्तर में लात-जूते खाने वाले सुनील भाटी केस में बड़ा उलटफेर, ‘समझौता’ होते ही संगठन में बगावत

उत्तर प्रदेश के पुलिस प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में भूचाल ला देने वाले चर्चित सुनील भाटी प्रकरण में एक अप्रत्याशित और चौंकाने वाला मोड़ आ गया है। जिस मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) कार्यालय के ठीक सामने दिनदहाड़े लात-घूंसे, बेल्ट और जूते चलने का खौफनाक वीडियो वायरल हुआ था और जिसे लेकर कई दिनों से धरना-प्रदर्शन व आंदोलन की चिंगारी सुलग रही थी, उसमें बंद कमरों के भीतर अचानक ‘सुलह-समझौता’ करा दिया गया। लेकिन यह समझौता विवाद को शांत करने के बजाय एक नई और बड़ी बगावत की वजह बन गया है। पीड़ितों के साथ खड़े होकर आंदोलन कर रहे कार्यकर्ताओं और संगठन के पदाधिकारियों को जैसे ही इस गोपनीय समझौते की भनक लगी, वे बुरी तरह भड़क उठे। संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं ने इसे स्वाभिमान और न्याय की लड़ाई के साथ खुला धोखा करार देते हुए सामूहिक रूप से इस्तीफों की झड़ी लगा दी है, जिससे पूरे इलाके का सियासी और सामाजिक पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है।

एसएसपी कार्यालय परिसर में हुआ था खूनी तांडव, वीडियो से मचा था हड़कंप

पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस वक्त हुई थी जब सुनील भाटी अपने कुछ साथियों के साथ किसी पुराने विवाद या प्रशासनिक शिकायत के सिलसिले में एसएसपी दफ्तर पहुंचे थे। उसी दौरान विपक्षी गुट के दर्जनों दबंगों ने उन्हें कार्यालय परिसर में ही घेर लिया। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद हमलावरों ने कानून की धज्जियां उड़ाते हुए सुनील भाटी को जमीन पर गिरा-गिराकर लात-जूतों और बेल्टों से बेरहमी से पीटा था। इस दौरान भाटी को गंभीर चोटें आई थीं और उनके कपड़े तक फट गए थे। सरकारी दफ्तर के भीतर हुई इस गुंडागर्दी का वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, पुलिस प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। मामले को तूल पकड़ता देख स्थानीय किसान संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बिरादरी के लोगों ने पीड़ित के पक्ष में मोर्चा खोल दिया था और आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग को लेकर एसएसपी कार्यालय का घेराव शुरू कर दिया था।

बंद कमरे में दबाव और रात के अंधेरे में हुआ ‘सौदा’, भड़के समर्थक

कई दिनों तक चले भारी धरने और आंदोलन के बीच शनिवार देर शाम अचानक इस पूरे प्रकरण की दिशा बदल गई। चर्चा है कि सत्ता पक्ष के कुछ रसूखदार नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों के भारी दबाव व मध्यस्थता के चलते दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठाया गया। घंटों चली मैराथन पंचायत के बाद दोनों पक्षों के बीच लिखित समझौते पर हस्ताक्षर करवा दिए गए। समझौते के तहत दर्ज मुकदमों को वापस लेने और आगे कोई कानूनी या सामाजिक विरोध न करने की सहमति बन गई। जैसे ही यह खबर धरने पर बैठे कार्यकर्ताओं तक पहुंची, वहां सन्नाटा खिंच गया और चंद ही पलों में यह खामोशी भारी आक्रोश में तब्दील हो गई। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जो लोग दिन में न्याय की दुहाई देकर समाज को सड़कों पर उतार रहे थे, उन्होंने रात के अंधेरे में निजी स्वार्थों और समझौते की मेज पर कार्यकर्ताओं के पसीने और आत्मसम्मान का सौदा कर दिया।

‘स्वाभिमान से समझौता बर्दाश्त नहीं’, दर्जनों पदाधिकारियों ने सौंपे इस्तीफे

समझौते की खबर सार्वजनिक होते ही संगठन के भीतर भयानक आंतरिक कलह फूट पड़ी। सुनील भाटी के समर्थन में अपनी जान की परवाह किए बिना लाठियां खाने और मुकदमे झेलने वाले युवा पदाधिकारियों ने इसे कार्यकर्ताओं की पीठ में छुरा घोंपना करार दिया। गुस्साए जिला स्तर, ब्लॉक स्तर और युवा इकाई के दर्जनों सक्रिय पदाधिकारियों ने सोशल मीडिया पर अपने त्यागपत्र सार्वजनिक कर दिए। इस्तीफा देने वाले नेताओं का दो टूक कहना है कि जब एसएसपी दफ्तर जैसी जगह पर किसी आम या सामाजिक व्यक्ति को सरेआम पीटा जाता है, तो वह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं बल्कि पूरे समाज के सम्मान पर हमला होता है। ऐसे संगीन मामले में बिना न्याय मिले और बिना दोषियों को सलाखों के पीछे भेजे झुक जाना कायरता है। संगठन के बड़े नेताओं पर दबाव में आकर आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाते हुए युवा कार्यकर्ताओं ने कहा कि वे ऐसे नेतृत्व के साथ अब एक पल भी काम नहीं कर सकते जो अपने ही कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान की रक्षा न कर सके।

पुलिस प्रशासन ने ली राहत की सांस, लेकिन जमीनी आक्रोश बरकरार

दूसरी ओर, इस समझौते के बाद स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन ने भले ही राहत की सांस ली हो कि एक बड़ा आंदोलन टल गया, लेकिन जमीनी स्तर पर तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाराज धड़े ने चेतावनी दी है कि वे समझौते को नहीं मानेंगे और यदि प्रशासन ने हमलावरों के खिलाफ निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई नहीं की, तो वे एक स्वतंत्र मंच बनाकर अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे। वहीं, संगठन के शीर्ष नेताओं द्वारा नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिशें तेज कर दी गई हैं, लेकिन इस्तीफों की लगातार बढ़ती संख्या यह साफ बयां कर रही है कि इस समझौते की आग अब अपनों के ही घर को जलाने पर आमादा है।

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