करवा चौथ की पूजा में केवल 1 घंटे 17 मिनट का अत्यंत दुर्लभ शुभ मुहूर्त, चौकी पर करवा कहां रखें और 7 बार करवा फेरने का क्या है सही शास्त्रीय नियम?

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाने वाला सुहाग का महापर्व करवा चौथ हर सुहागिन के जीवन में अखंड सौभाग्य, समर्पण और अटूट प्रेम का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इस वर्ष करवा चौथ पर शाम की मुख्य पूजा के लिए केवल 1 घंटे 17 मिनट का अत्यंत पावन और दुर्लभ शुभ मुहूर्त मिल रहा है। वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणनाओं के अनुसार, शाम को प्रदोष काल और अमृत चौघड़िया का संयोग शाम 5 बजकर 36 मिनट से लेकर शाम 6 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया है कि करवा चौथ की मुख्य कथा और शिव परिवार का विधिवत पूजन सूर्यास्त के तुरंत बाद प्रदोष काल में ही संपन्न कर लेना चाहिए। इस निर्धारित 1 घंटे 17 मिनट की समयावधि में माता पार्वती, भगवान शिव, कार्तिकेय, प्रथम पूज्य गणेश जी और चौथ माता की उपासना करने से दांपत्य जीवन की समस्त नकारात्मकताएं, ग्रह दोष और अकाल संकट पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और पंजाब समेत पूरे देश में इस शुभ अवधि के दौरान सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होती हैं। यदि किसी कारणवश इस मुहूर्त में देरी होती है, तो पूजा का फल प्रभावित हो सकता है, इसलिए संध्या काल शुरू होने से पहले ही पूजा स्थल और सभी आवश्यक सामग्रियों की तैयारी पूर्ण कर लेनी चाहिए।

पूजा की चौकी पर करवा कहां और किस दिशा में रखें? जानिए शास्त्रीय स्थान और नियम

करवा चौथ की पूजा का सबसे प्रमुख और संवेदनशील हिस्सा है चौकी पर ‘करवा’ स्थापित करना, जिसमें अक्सर नई व्रती महिलाएं भ्रमित हो जाती हैं। ज्योतिष और वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूजा की चौकी हमेशा घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या पूर्व दिशा में स्थापित करनी चाहिए। चौकी पर सबसे पहले लाल या पीला नया सूती या रेशमी वस्त्र बिछाएं। इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा या करवा चौथ का पारंपरिक कैलेंडर स्थापित करें। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि करवा चौकी पर किस तरफ रखा जाए। शास्त्रों के अनुसार, मिट्टी या धातु का करवा हमेशा चौकी के दाहिनी ओर यानी व्रती महिला जब पूजा के लिए बैठे तो उसके ठीक सामने दाईं तरफ (Right Hand Side) स्थापित होना चाहिए। पूजा में हमेशा दो करवे रखे जाते हैं। पहला करवा माता पार्वती (गौरी मां) का होता है, जिसे देवी का स्वरूप मानकर स्थापित किया जाता है। दूसरा करवा स्वयं व्रती महिला का होता है, जिससे रात में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। माता पार्वती के निमित्त रखे जाने वाले करवे को बाईं ओर और स्वयं के करवे को दाहिनी ओर रखना सबसे शुभ माना जाता है। करवे के अंदर शुद्ध गंगाजल, कच्चा दूध, रोली, अक्षत, सिक्का और सुपारी डाली जाती है। करवे की टोटी (चोंच) हमेशा पूर्व दिशा या उत्तर दिशा की ओर रखी जानी चाहिए। करवे के ऊपर एक मिट्टी या तांबे की ढक्कन (सकोरा) रखी जाती है, जिसमें गेहूं के दाने, खील, बताशे या खांड की मिठाई भरी जाती है।

‘ले सुहागन करवा ले, दे सुहागन करवा दे’: 7 बार करवा फेरने की सही विधि और नियम

करवा चौथ की संध्या पूजा में कथा श्रवण के उपरांत ‘करवा फेरना’ सबसे महत्वपूर्ण और भावुक अनुष्ठान माना जाता है। कई महिलाएं जल्दबाजी या अज्ञानतावश करवा फेरने की विधि में गलतियां कर बैठती हैं। शास्त्रों के अनुसार, करवा फेरने की रस्म हमेशा दो सुहागिन महिलाएं आमने-सामने बैठकर निभाती हैं। यदि घर में केवल एक ही व्रती महिला है, तो वह माता गौरी की प्रतिमा को साक्षी मानकर उनके साथ यह क्रिया संपन्न करती हैं। करवा फेरने की कुल संख्या ठीक सात (7) बार होनी चाहिए। दोनों महिलाएं अपने-अपने करवे को दोनों हाथों से आधार देकर उठाती हैं और बड़े ही आदर व शांत भाव से एक-दूसरे के हाथ में करवे का आदान-प्रदान करती हैं। जब एक महिला करवा देती है, तो वह मन में या मुख से लोकगीत की पंक्ति उच्चारित करती है: “ले सुहागन करवा ले, दे सुहागन करवा दे, वंद प्यारा करवा दे।” सात बार करवे की अदला-बदली करने के बाद, सातवें फेरे पर अपने मूल करवे को ही अपने पास वापस लिया जाता है। इस विधान का गहरा आध्यात्मिक अर्थ यह है कि समाज की सभी सुहागिनें एक-दूसरे के सुख, शांति और सौभाग्य की मंगलकामना कर रही हैं और अपने सुहाग का तेज परस्पर बांट रही हैं। करवा फेरते समय कभी भी करवे की टोटी एक-दूसरे से टकराने या जल छलकने नहीं देना चाहिए। पूजा समाप्त होने के बाद, मां गौरी के निमित्त रखा गया पहला करवा घर की पूज्य सास, जेठानी या ननद को पैर छूकर भेंट किया जाता है, जिससे कुल परंपरा और बड़ों का शुभाशीर्वाद प्राप्त होता है।

पूजा की थाली की संपूर्ण सामग्री और माता पार्वती का 16 श्रृंगार पूजन विधान

करवा चौथ की थाली को केवल एक पूजा सामग्री नहीं, बल्कि अखंड सौभाग्य का दर्पण माना जाता है। पूजा की थाली में कुमकुम (रोली), अक्षत (अटूट कच्चे चावल), चंदन, हल्दी, ताजे पीले या लाल पुष्प, दूर्वा, धूपबत्ती, शुद्ध गाय के घी का दीपक, नैवेद्य (मिठाई व फल), कपूर और कलावा अनिवार्य रूप से होना चाहिए। इसके साथ ही, माता गौरी को अर्पित करने के लिए सोलह श्रृंगार की सामग्री थाली में सजाई जाती है, जिसमें लाल चुनरी, सिंदूर, महावर (आलता), बिंदी, कांच की लाल चूड़ियां, मेहंदी, काजल, कंघी, शीशा, पायल और बिछिया शामिल हैं। संध्या काल के 1 घंटे 17 मिनट के शुभ मुहूर्त में पूजा आरंभ करते समय सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करते हुए उन्हें दूर्वा और मोदक अर्पित करें। इसके बाद माता पार्वती और भगवान शिव का पंचामृत व गंगाजल से प्रतीकात्मक अभिषेक करें। मां गौरी को सिंदूर और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करते हुए अपने पति की दीर्घायु का वरदान मांगें। इसके बाद करवा चौथ की प्रामाणिक व्रत कथा का शांत मन से श्रवण करें। कथा सुनते समय हाथ में गेहूं के 13 दाने और पुष्प अवश्य रखें। कथा पूर्ण होने पर इन 13 दानों को अपने पल्लू में बांध लें या करवे के ढक्कन में अर्पित कर दें।

आटे का चौमुखी दीपक, छलनी और अर्घ्य: चंद्र दर्शन से पारण तक की संपूर्ण प्रक्रिया

शाम की पूजा संपन्न होने के बाद रात को चंद्रोदय का इंतजार किया जाता है। चंद्रमा की पूजा के लिए गूंथे हुए गेहूं के आटे से बना चौमुखी दीपक ही सबसे सात्विक और फलदायी माना जाता है। इसमें गाय का शुद्ध देसी घी भरकर चार बत्तियां जलाई जाती हैं। जब चंद्रमा का उदय हो, तो व्रती महिला अपनी पूजा की थाली में आटे का जलता हुआ दीपक, जल से भरा करवा, रोली, अक्षत, मिष्ठान और बारीक जाली वाली छलनी लेकर खुले स्थान या छत पर जाएं। सबसे पहले छलनी के ऊपर आटे का दीपक रखें। छलनी की ओट से दीपक की लौ के पीछे से चंद्रमा के दर्शन करें। इसके बाद बिना नजर हटाए उसी छलनी से अपने पति का मुख निहारें। इसके तुरंत बाद करवे की टोटी से चंद्रमा को जल की अखंड धार बनाकर अर्घ्य अर्पित करें। अर्घ्य देते समय ध्यान रहे कि जल की धार पैरों पर न गिरे, इसके लिए नीचे कोई थाली या पुष्प रख लें और “ॐ सोमाय नमः” का जप करें। अर्घ्य के बाद चंद्रमा को रोली-अक्षत और मिठाई अर्पित कर प्रणाम करें। इसके बाद अपने पति की आरती उतारें, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। अंत में पति अपने हाथों से पत्नी को उसी करवे का पवित्र जल पिलाकर और मिठाई खिलाकर निर्जला व्रत का पारण कराते हैं। इस प्रकार शास्त्रीय विधि से पूर्ण किया गया यह व्रत दांपत्य जीवन में आजीवन प्रेम, विश्वास और सौभाग्य की वर्षा करता है।

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