30 दिन में 77% मरीजों की संक्रमण से मौत, मेडिकल रिपोर्ट में ‘सुपरबग्स’ और लचर प्रोटोकॉल का खौफनाक खुलासा

देश के बड़े और प्रतिष्ठित अस्पतालों को लेकर एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली सच्चाई सामने आई है, जिसने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। जो अस्पताल मरीजों को नया जीवन देने का दावा करते हैं, वही अस्पताल आज जानलेवा संक्रमण का सबसे बड़ा केंद्र बनते जा रहे हैं। हालिया चिकित्सा अध्ययनों और आईसीएमआर (ICMR) के एंटीमाइक्रोबियल सर्विलांस डेटा से जुड़े डराने वाले आंकड़ों के अनुसार, अस्पतालों के इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) और क्रिटिकल केयर वार्डों में भर्ती होने वाले मरीजों में से जो ‘हॉस्पिटल एक्वायर्ड इन्फेक्शन’ (HAI यानी अस्पताल जनित संक्रमण) की चपेट में आते हैं, उनमें से लगभग 77 फीसदी मरीज संक्रमण के 30 दिनों के भीतर दम तोड़ देते हैं। दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, मुंबई, पटना, जयपुर, भोपाल और बेंगलुरु जैसे बड़े मेडिकल हब वाले शहरों में यह संकट तेजी से पैर पसार चुका है। किसी गंभीर सड़क दुर्घटना, सामान्य सर्जरी, हार्ट अटैक या फ्रैक्चर के इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे मरीज जब वहां के गंदे उपकरणों, दूषित वातावरण और लापरवाही भरे सिस्टम से इन्फेक्शन का शिकार होते हैं, तो उनकी बीमारी का रूप पूरी तरह बदल जाता है और वे जिंदा बचकर बाहर नहीं आ पाते।

अस्पतालों के भीतर ही क्यों दम तोड़ रहे मरीज: मेडिकल स्टडीज का खौफनाक सच

अस्पताल में भर्ती होने के 48 घंटे बाद मरीज के शरीर में पनपने वाले संक्रमण को मेडिकल भाषा में ‘नोसोकोमियल इन्फेक्शन’ या हॉस्पिटल एक्वायर्ड इन्फेक्शन कहा जाता है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह इन्फेक्शन मरीज अपने घर से लेकर नहीं आता, बल्कि यह उसे अस्पताल के आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर या वॉर्ड की हवा, सतह और मेडिकल स्टाफ के हाथों से मिलता है। आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जब किसी मरीज को आईसीयू में वेंटिलेटर या सेंट्रल वीनस लाइन पर रखा जाता है, तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही काफी कमजोर होती है। ऐसे में अस्पताल के भीतर मौजूद बेहद खतरनाक और जिद्दी बैक्टीरिया मरीज के खून में प्रवेश कर जाते हैं। जब यह बैक्टीरिया मरीज के रक्त प्रवाह में फैलकर ‘ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन’ या ‘सेप्टिक शॉक’ पैदा करते हैं, तो शरीर के महत्वपूर्ण अंग—किडनी, लिवर और फेफड़े—एक-एक करके काम करना बंद कर देते हैं। 30 दिनों का समय वह क्रिटिकल विंडो होता है, जहां शरीर इन रोगाणुओं के खिलाफ जंग लड़ता है, लेकिन सही समय पर सही दवा और एंटीबायोटिक के काम न करने की वजह से 77 प्रतिशत मामलों में मरीज की मल्टी-ऑर्गन फेलियर से मौत हो जाती है।

जब ‘सुपरबग्स’ पर फेल हो जाती हैं रिजर्व एंटीबायोटिक्स: दवाओं के बेअसर होने का खौफ

अस्पतालों में होने वाली इन मौतों की सबसे मुख्य और खौफनाक वजह है ‘सुपरबग्स’ (Superbugs) का प्रकोप। सुपरबग्स ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जिन पर दुनिया की सबसे ताकतवर और आधुनिक एंटीबायोटिक दवाएं भी पूरी तरह बेअसर साबित होती हैं। भारतीय अस्पतालों के आईसीयू में क्लेबसिएला न्यूमोनी (Klebsiella pneumoniae), एसिनैटोबैक्टर बॉमनी (Acinetobacter baumannii) और स्यूडोमोनास एरुगिनोसा (Pseudomonas aeruginosa) जैसे बैक्टीरिया अब ‘कार्बापेनेम-रेसिस्टेंट’ (CRE) हो चुके हैं। कार्बापेनेम वह उच्च श्रेणी की एंटीबायोटिक मानी जाती है, जिसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब बाकी सभी दवाएं फेल हो जाती हैं। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि डॉक्टरों के पास मरीजों को देने के लिए अंतिम विकल्प मानी जाने वाली ‘कोलिसटिन’ (Colistin) जैसी अत्यधिक जहरीली दवा भी इन बैक्टीरिया के आगे घुटने टेक रही है। जब मरीज के शरीर में ऐसा बैक्टीरिया प्रवेश कर जाता है जिस पर कोई भी दवा काम नहीं करती, तो डॉक्टर असहाय हो जाते हैं। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण अस्पतालों में अंधाधुंध और बिना कल्चर टेस्ट के ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का भारी दुरुपयोग है, जिसने साधारण बैक्टीरिया को भी अजेय सुपरबग में तब्दील कर दिया है।

वेंटिलेटर और कैथेटर से फैल रहा जहर: आईसीयू में बुनियादी प्रोटोकॉल की धज्जियां

अस्पतालों में संक्रमण फैलने का सबसे सीधा जरिया वे जीवनरक्षक उपकरण हैं, जिन्हें मरीज को बचाने के लिए लगाया जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, आईसीयू में होने वाले संक्रमणों में तीन प्रकार के इन्फेक्शन सबसे ज्यादा जानलेवा साबित होते हैं: पहला, वेंटिलेटर-एसोसिएटेड निमोनिया (VAP); दूसरा, सेंट्रल लाइन-एसोसिएटेड ब्लडस्ट्रीम इन्फेक्शन (CLABSI); और तीसरा, कैथेटर-एसोसिएटेड यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (CAUTI)। जब वेंटिलेटर की ट्यूब्स को सही तरीके से डिसइन्फेक्ट नहीं किया जाता या लंबे समय तक एक ही ट्यूब मरीज के गले में पड़ी रहती है, तो बैक्टीरिया सीधे फेफड़ों की गहराई में उतरकर उन्हें सड़ा देते हैं। इसी तरह, दिल के करीब डाली जाने वाली सेंट्रल लाइन की ड्रेसिंग में लापरवाही बरतने से बैक्टीरिया सीधे खून में घुल जाते हैं। निजी अस्पतालों में अक्सर देखा जाता है कि मुनाफे के चक्कर में डिस्पोजेबल सामानों को बार-बार स्टेरलाइज करके दोबारा इस्तेमाल किया जाता है, जो सीधे तौर पर मरीजों की जान के साथ आपराधिक खिलवाड़ है।

हैंड हाइजीन और बायोमेडिकल वेस्ट: मुनाफे की होड़ में बुनियादी सफाई से समझौता

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के स्पष्ट निर्देश हैं कि किसी भी डॉक्टर, नर्स या वॉर्ड बॉय को एक मरीज को छूने के बाद और दूसरे मरीज के पास जाने से पहले अपने हाथों को अल्कोहल-बेस्ड सैनिटाइजर से साफ करना या हाथ धोना अनिवार्य है। लेकिन भारत के कई सरकारी और निजी अस्पतालों में स्टाफ की भारी कमी और अत्यधिक वर्कलोड के चलते इस बुनियादी ‘हैंड हाइजीन’ प्रोटोकॉल को पूरी तरह ताक पर रख दिया जाता है। डॉक्टर का स्टेथोस्कोप, नर्स की फाइल, मोबाइल फोन और बेड की रेलिंग तक जानलेवा बैक्टीरिया से पटी होती हैं। इसके अलावा, अस्पतालों में एयर-कंडीशनिंग सिस्टम के एचईपीए (HEPA) फिल्टर्स की समय पर सफाई न होना और बायोमेडिकल कचरे का सही निस्तारण न किया जाना संक्रमण को पूरे अस्पताल में फैला देता है। कई कॉरपोरेट अस्पताल बाहर से तो पांच सितारा होटलों जैसे चमकते हैं, लेकिन उनके आईसीयू के अंदर का माइक्रोबायोलॉजिकल वातावरण किसी टाइम बम की तरह टिक-टिक कर रहा होता है।

30 दिनों का खौफनाक चक्र: सामान्य बुखार से लेकर मल्टी-ऑर्गन फेलियर तक

संक्रमण के बाद 30 दिनों के भीतर मौत का जो 77% का डरावना आंकड़ा सामने आया है, उसकी प्रक्रिया बेहद दर्दनाक होती है। अस्पताल में भर्ती होने के तीसरे या चौथे दिन मरीज को अचानक तेज कंपकंपी के साथ बुखार आता है। तीमारदारों को लगता है कि यह पुरानी बीमारी का असर है, लेकिन वास्तव में यह नोसोकोमियल इन्फेक्शन की शुरुआत होती है। अगले 48 से 72 घंटों में मरीज के खून में व्हाइट ब्लड सेल्स (WBC) की संख्या या तो अत्यधिक बढ़ जाती है या तेजी से गिर जाती है, और प्लेटलेट्स क्रैश होने लगते हैं। इसके बाद बैक्टीरिया द्वारा छोड़े गए टॉक्सिन्स पूरे शरीर की रक्त नलिकाओं को डाइलेट (चौड़ा) कर देते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर गिर जाता है। इसे ‘सेप्टिक शॉक’ कहते हैं। रक्तचाप गिरने से शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को ऑक्सीजन मिलना बंद हो जाती है। मरीज का यूरिन आउटपुट शून्य हो जाता है, फेफड़े पानी से भर जाते हैं और दिल की गति अनियंत्रित हो जाती है। मरीज को वेंटिलेटर पर डालकर डायलिसिस शुरू किया जाता है, लाखों रुपये के बिल बनते हैं, लेकिन शरीर के अंदर दवाओं के बेअसर होने के कारण मरीज अंततः दम तोड़ देता है।

तीमारदार और मरीज क्या करें: इस जानलेवा खतरे से बचने के 5 कानूनी व मेडिकल उपाय

इस जानलेवा संकट के बीच आम जनता को अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति अत्यधिक सतर्क होने की आवश्यकता है। अगर आपका कोई परिजन अस्पताल में भर्ती है, तो इन बातों पर कड़ा पहरा रखें:

  1. हैंड हाइजीन पर सीधी निगरानी: आईसीयू में मरीज को छूने से पहले किसी भी डॉक्टर, नर्स या विजिटर को हाथ सैनिटाइज करने के लिए बेझिझक टोकें। यह आपका कानूनी और बुनियादी स्वास्थ्य अधिकार है।

  2. संक्रमण दर की जानकारी मांगें: अस्पताल में भर्ती कराने से पहले वहां के ‘इन्फेक्शन कंट्रोल रेट’ और ‘हॉस्पिटल इन्फेक्शन कंट्रोल कमेटी’ (HICC) के ऑडिट के बारे में जानकारी हासिल करें। नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स (NABH) से प्रमाणित अस्पतालों को प्राथमिकता दें।

  3. कल्चर टेस्ट के बिना हाई-एंड एंटीबायोटिक्स का विरोध करें: यदि डॉक्टर बार-बार महंगी और अत्यधिक हाई एंटीबायोटिक्स बदल रहे हैं, तो उनसे तुरंत ब्लड, यूरिन या स्प्यूटम कल्चर सेंसिटिविटी रिपोर्ट की मांग करें ताकि पता चल सके कि कौन सी सटीक दवा असर करेगी।

  4. अनावश्यक कैथेटर और नलियों को जल्द से जल्द हटवाएं: मरीज की स्थिति स्थिर होते ही डॉक्टर से यूरिनरी कैथेटर, आईवी ड्रिप और वेंटिलेटर ट्यूब्स को हटाने का आग्रह करें, क्योंकि जितने ज्यादा दिन ये उपकरण शरीर में रहेंगे, संक्रमण का खतरा उतना ही गुना बढ़ जाएगा।

  5. कानूनी अधिकार और मेडिकल नेग्लिजेंस: यदि अस्पताल की स्पष्ट लापरवाही, अनस्टेरलाइज्ड उपकरणों या गंदे वातावरण के कारण मरीज में गंभीर नोसोकोमियल इन्फेक्शन फैलता है, तो यह ‘क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट’ और ‘कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत घोर मेडिकल लापरवाही (Medical Negligence) का मामला बनता है। मरीज के तीमारदार अस्पताल के सभी डेली मेडिकल चार्ट्स, नर्सिंग नोट्स और कल्चर रिपोर्ट्स की सर्टिफाइड कॉपी तुरंत सुरक्षित रख लें, ताकि आवश्यकता पड़ने पर राज्य मेडिकल काउंसिल या उपभोक्ता अदालत में जवाबदेही तय की जा सके। यह वक्त केवल अंधविश्वास के साथ इलाज कराने का नहीं, बल्कि अस्पतालों के हर कदम पर पैनी नजर रखकर अपनों की जान बचाने का है।

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