‘काश! मैंने ट्रेन से भेजा होता…’: यमुना एक्सप्रेसवे बस अग्निकांड में पिता को खो चुके बेटे का छलका दर्द

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर बुधवार देर रात हुए भीषण स्लीपर बस अग्निकांड ने कई परिवारों की खुशियां पलक झपकते ही छीन लीं। दिल्ली से महोबा जा रही इस डबल डेकर वातानुकूलित (AC) बस में आग का गोला बनने से 9 जिंदगियां हमेशा के लिए खामोश हो गईं। इस दिल दहला देने वाले हादसे में महोबा के रहने वाले 61 वर्षीय बुजुर्ग देवेंद्र भारद्वाज की भी दर्दनाक मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी रेखा गंभीर रूप से घायल हो गईं। इस हादसे के बाद उनके बेटे का रो-रोकर बुरा हाल है और वह खुद को जिंदगी भर के लिए एक ऐसे पछतावे में घसीट चुका है जिसका कोई अंत नहीं है। बिलखते हुए बेटे की जुबान पर बस एक ही बात है—”काश! मैंने माता-पिता की बात मान ली होती और उन्हें ट्रेन से ही भेजा होता, यह फैसला मेरे पिता का आखिरी सफर बन गया।”

ट्रेन कैंसिल कराकर बुक किया था एसी बस का टिकट

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के महोबा के रहने वाले देवेंद्र भारद्वाज के बेटे सर्वज्ञ हरियाणा के रोहतक में अपना व्यवसाय करते हैं। उनके माता-पिता कुछ दिन पहले ही उनसे मिलने रोहतक आए हुए थे। इसी दौरान महोबा में सर्वज्ञ की दादी का देहांत हो गया। अपनी मां के अंतिम संस्कार और क्रिया-कर्म में शामिल होने के लिए देवेंद्र भारद्वाज अपनी पत्नी रेखा के साथ महोबा जाने की तैयारी में थे।

बुजुर्ग दंपति की इच्छा ट्रेन से सफर करने की थी, लेकिन बेटे सर्वज्ञ ने सोचा कि ट्रेन की भीड़भाड़, धक्का-मुक्की और स्टेशन पर सामान उठाने में बुजुर्ग माता-पिता को परेशानी न उठानी पड़े। उन्होंने पिता की सुविधा का ख्याल रखते हुए ट्रेन की टिकट कैंसिल करा दी और ऑनलाइन एक लग्जरी एसी स्लीपर बस की लोअर बर्थ (निचली सीट) बुक कर दी। सर्वज्ञ ने निचली सीट इसलिए चुनी थी क्योंकि उनके पिता के पैर में पहले से रॉड पड़ी हुई थी और उन्हें चलने-फिरने में कठिनाई होती थी। उन्हें लगा था कि बस की यात्रा ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित रहेगी, लेकिन उन्हें रत्ती भर भी अंदेशा नहीं था कि उनका यही फैसला उनके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए छीन लेगा।

रात में हुई थी आखिरी बात, सुबह बंद मिला फोन

सर्वज्ञ ने बताया कि बुधवार रात करीब 10:30 बजे बस दिल्ली सीमा पार कर रही थी, तब उनकी अपनी मां से फोन पर बात हुई थी। मां ने बताया था कि सफर ठीक चल रहा है और वे समय पर पहुंच जाएंगे। इसके बाद गुरुवार तड़के करीब 6 बजे जब सर्वज्ञ ने बस की लोकेशन और मां की खैरियत जानने के लिए फोन मिलाया, तो दोनों फोन स्विच ऑफ मिले। घबराए बेटे ने तुरंत बस के ड्राइवर और कंडक्टर के नंबर पर संपर्क किया, लेकिन उनके नंबर भी बंद आ रहे थे। अनहोनी की आशंका के बीच सर्वज्ञ ने ट्रैवल एजेंसी के हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क किया, जहां से उन्हें सूचना मिली कि जिस बस में उनके माता-पिता सवार थे, उसमें यमुना एक्सप्रेसवे के जेवर इलाके के पास भीषण आग लग गई है।

अस्पताल में घायल मां ने पूछा- ‘पिता कहां हैं?’, बेटे के पास नहीं था जवाब

हादसे की खबर सुनते ही सर्वज्ञ अपने दोस्त के साथ बदहवास हालत में जेवर के निजी अस्पताल पहुंचे। वहां आपातकालीन वार्ड में उनकी मां रेखा भारद्वाज दर्द से कराहती मिलीं। बेटे को देखते ही मां ने रोते हुए पहला सवाल यही पूछा—”बेटा, तुम्हारे पिता कहां हैं? वे बस में पीछे रह गए थे, उन्हें ढूंढ लाओ।” मां के इस सवाल ने सर्वज्ञ के कलेजे को चीर कर रख दिया।

मां रेखा ने रोते हुए उस खौफनाक मंजर को याद करते हुए बताया कि जब बस में आग की लपटें उठीं और दमघोंटू काला धुआं भर गया, तो वह दरवाजे की तरफ भागीं। अफरा-तफरी और चीख-पुकार के बीच अन्य यात्रियों के धक्के से वह फर्श पर गिर गईं और लोग अपनी जान बचाने के लिए उनके ऊपर से होकर गुजरने लगे। किसी तरह वह रेंगते हुए बाहर निकल सकीं, लेकिन पैर में रॉड होने के कारण देवेंद्र भारद्वाज तेजी से हिल नहीं पाए और घने धुएं व आग की लपटों के बीच बस के अंदर ही फंसे रह गए। पुलिस और प्रशासन ने बाद में बेटे को पुष्टि की कि देवेंद्र भारद्वाज की दम घुटने और जलने से मौत हो चुकी है।

‘मुझे दो लाख का मुआवजा नहीं, मेरे पिता वापस लौटा दो’

हादसे के बाद जब स्थानीय प्रशासन ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा घोषित दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता का जिक्र किया, तो शोकाकुल बेटे का गुस्सा और दर्द छलक पड़ा। सर्वज्ञ ने हाथ जोड़ते हुए बेहद भावुक लहजे में कहा, “मुझे सरकार या किसी के दो लाख रुपयों की कोई जरूरत नहीं है। मैं अपनी जेब से चार लाख रुपये देने को तैयार हूं, बस कोई मेरे पिता को वापस लौटा दे। एक ही दिन में हमारे परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है—एक तरफ दादी की मौत का सदमा और दूसरी तरफ पिता का यूं चले जाना, हम पूरी तरह अनाथ हो गए हैं।”

यात्रियों ने यह भी आरोप लगाया कि बस में आग लगने से पहले ही जलने की गंध आने लगी थी, लेकिन चालक और परिचालक ने चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया और बस रोकने से इनकार कर दिया था। लापरवाही की इस भेंट चढ़े देवेंद्र भारद्वाज के बेटे को अब ताउम्र इस बात का मलाल सताता रहेगा कि अगर उसने अपनी जिद छोड़कर पिता की बात मान ली होती और उन्हें ट्रेन से जाने दिया होता, तो आज उनका परिवार इस असहनीय दर्द से न गुजर रहा होता।

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