
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के शीर्ष नेतृत्व पर एक बड़ा कानूनी संकट खड़ा हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी की नियुक्तियों को सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल इस याचिका में ‘क्वो वारंटो’ (Quo Warranto यानी अधिकार पृच्छा) रिट जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता ने अदालत से सीधा सवाल किया है कि तीनों अधिकारी किस कानूनी अधिकार के तहत अपने-अपने पदों पर आसीन हैं? यह याचिका ऐसे समय में आई है जब हाल ही में चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर खींचतान और कथित एकतरफा आदेशों के मामलों पर भी शीर्ष अदालत ने केंद्र व चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था।
चयन प्रक्रिया और पैनल निर्माण में 2023 कानून के गंभीर उल्लंघन का आरोप
याचिका में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ के प्रावधानों का खुला उल्लंघन करने का दावा किया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार:
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धारा 6 के तहत पैनल का अभाव: कानून की धारा 6 के तहत सर्च कमेटी को प्रत्येक रिक्त पद के लिए 5 योग्य व्यक्तियों का एक विस्तृत पैनल तैयार करना अनिवार्य था। मार्च 2024 में जब दो चुनाव आयुक्तों के पद खाली थे, तो नियमानुसार 10 नामों का पैनल बनना चाहिए था, लेकिन समिति ने मात्र 6 नामों का संक्षिप्त पैनल पेश किया।
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जल्दबाजी में चयन का दावा: याचिका में सुप्रीम कोर्ट की 22 मार्च 2024 की उस टिप्पणी का हवाला दिया गया है जिसमें अदालत ने उम्मीदवारों के विवरण चयन समिति को समय पर न देने और प्रक्रिया में दिखाई गई हड़बड़ी पर चिंता जताई थी।
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विपक्ष के नेता को समय न मिलना: यह भी आरोप लगाया गया है कि कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने 200 से अधिक नामों की सूची आधी-अधूरी स्थिति में विपक्ष के नेता को भेजी और अगले ही दिन सर्च कमेटी की सिफारिश पर उसी दिन नियुक्ति पर मुहर लगा दी गई, जिससे निष्पक्ष जांच का अवसर नहीं मिला।
चुनावी प्रबंधन और अनुभव पर सवाल: क्या पूरी होती हैं पात्रता की शर्तें?
कानूनी चुनौती का सबसे अहम बिंदु अधिकारियों की प्रशासनिक योग्यता और प्रासंगिक अनुभव से जुड़ा है। कानून की धारा 5 के अनुसार, इस पद पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति के पास भारत सरकार के सचिव स्तर के अनुभव के साथ-साथ ‘चुनावों के प्रबंधन एवं संचालन’ का प्रमाणित ज्ञान और अनुभव होना अनिवार्य है।
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सर्विसेज रिकॉर्ड में चुनावी जिम्मेदारी का अभाव: याचिका में दावा किया गया है कि ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू के आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड (Executive Service Details) में उनके लंबे करियर के दौरान चुनाव संचालन या निर्वाचन प्रबंधन से जुड़ी किसी विशेष जिम्मेदारी का उल्लेख नहीं मिलता।
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स्थानांतरण बनाम चुनाव कार्य: याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि ज्ञानेश कुमार के सेवा काल में 26 अलग-अलग विभागों में तबादले दर्ज हैं, लेकिन उनमें से कोई भी कार्य चुनाव प्रबंधन के दायरे में वर्गीकृत नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठाया गया है कि अनुभव की वैधानिक शर्त पूरी किए बिना उन्हें देश के चुनाव तंत्र का प्रमुख कैसे बनाया गया।
धारा 8(1) और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर कठघरे में सरकार
याचिका में अधिनियम की धारा 8(1) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि चयन समिति को अपनी पूरी प्रक्रिया एक पारदर्शी तरीके (Transparent Manner) से विनियमित करनी थी। लेकिन चयन समिति ने चयन करने से पहले किस प्रक्रिया या मानदंड को अपनाया, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड या पारदर्शी दस्तावेज मौजूद नहीं है। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि नियुक्ति से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों को हासिल करने के लिए दायर की गई आरटीआई (RTI) अर्जियां भी लंबित रखी गई हैं। फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाए जाने की अधिसूचना को भी कानून की भावना के विपरीत बताते हुए रद्द करने की गुहार लगाई गई है।
सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर टिकी नजरें, निर्वाचन आयोग की साख का सवाल
यह याचिका ऐसे नाजुक मोड़ पर आई है जब देश में विभिन्न राज्यों के आगामी चुनावों और मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका पहले से ही चर्चा के केंद्र में है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस नई याचिका पर अपना कोई रुख तय नहीं किया है और न ही गुण-दोष के आधार पर कोई आदेश पारित किया है, लेकिन यदि शीर्ष अदालत इस मामले में नोटिस जारी करती है या केंद्र से जवाब तलब करती है, तो चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यप्रणाली पर एक नई राष्ट्रीय बहस छिड़ना तय है।
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