
पश्चिम बंगाल के राजनीतिक और शैक्षणिक परिदृश्य में एक बार फिर तीखी वैचारिक बहस छिड़ गई है। कोलकाता में आयोजित एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान स्कूली शिक्षा मंत्री ने प्रदेश के उच्च शिक्षण संस्थानों के माहौल, राष्ट्रवाद और मदरसों के संचालन को लेकर बेहद आक्रामक और बेबाक टिप्पणी की है। उन्होंने खुले मंच से आरोप लगाया कि उच्च शिक्षा के कुछ चुनिंदा संस्थानों में आज भी ‘दिमागी नक्सली’ (अर्बन/इंटेलेक्चुअल नक्सल) तत्व पूरी तरह सक्रिय हैं, जो युवा पीढ़ी और मासूम छात्रों के जेहन में देशविरोधी विचार और जहर घोलने का षड्यंत्र रच रहे हैं। इसके साथ ही राज्य में शिक्षा सुधारों और पारदर्शिता का हवाला देते हुए शिक्षा मंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि जिन मदरसों के पास तय मानक, बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और जो बिना किसी सरकारी मान्यता के केवल कागजों पर चलाए जा रहे हैं, उन्हें तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाना चाहिए। इस दोहरे प्रहार ने राज्य की सियासत और शिक्षा जगत में नया तूफान खड़ा कर दिया है।
सरस्वती शिशु मंदिर के मंच से बोले मंत्री: ‘दिमागी नक्सल’ घोल रहे हैं जहर
कोलकाता में विद्या भारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर के एक विशेष कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे शिक्षा मंत्री ने आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय चेतना के बीच समन्वय पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि आज के दौर में जब देश ‘वंदे मातरम’ के 150वें वर्ष का ऐतिहासिक उत्सव मना रहा है, ऐसे समय में युवा पीढ़ी को भारत के वास्तविक इतिहास और सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना पहले से कहीं अधिक अनिवार्य हो गया है।
मंत्री ने चिंता जाहिर करते हुए कहा:
“उच्च शिक्षा से जुड़े कुछ संस्थानों में आज भी ‘दिमागी नक्सली’ ताकतें सक्रिय रूप से अपनी जड़ें जमाए हुए हैं। ये तत्व नई उम्र के सीधे-सादे और मासूम विद्यार्थियों को भड़काकर उनके भीतर राष्ट्र विरोधी मानसिकता पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। इस जहरीली विचारधारा का मुकाबला केवल और केवल राष्ट्रवादी शिक्षा और ऐतिहासिक तथ्यों की सही समझ के जरिए ही किया जा सकता है।”
उन्होंने जोर देकर कहा कि हमारी युवा पीढ़ी जितने गहरे तरीके से देश के सच्चे इतिहास, बलिदानों और संस्कृति को समझेगी, वह उतनी ही अधिक राष्ट्रभक्त बनेगी। जैसे-जैसे नई पीढ़ी में राष्ट्रीय गौरव का संचार होगा, ये तथाकथित दिमागी नक्सली अपने आप अप्रासंगिक हो जाएंगे और उनकी विनाशकारी नीतियां हमेशा के लिए भुला दी जाएंगी।
विपक्ष के विरोध पर तंज: ‘सरकार के विरोध के चक्कर में देश का विरोध करने लगते हैं लोग’
वैचारिक स्वतंत्रता और लोकतंत्र में असहमति की भूमिका पर बोलते हुए शिक्षा मंत्री ने दुनिया के विकसित देशों का उदाहरण सामने रखा। उन्होंने कहा कि विकसित और परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भी विपक्षी दल होते हैं और नीतियों को लेकर तीखे मतभेद भी देखने को मिलते हैं, लेकिन वहां का विपक्ष सरकार की नीतियों का विरोध करता है, देश की संप्रभुता का नहीं।
मंत्री ने अफसोस जताते हुए कहा:
“दुर्भाग्यवश हमारे देश में एक विचित्र और खतरनाक प्रवृत्ति देखने को मिलती है, जहां कुछ लोग सरकार को ही पूरा देश मान बैठते हैं। नतीजा यह होता है कि सत्ताधारी दल या सरकार की नीतियों का विरोध करते-करते वे अपनी सीमाओं को लांघ जाते हैं और सीधे देश और राष्ट्रीय प्रतीकों का ही विरोध करने लगते हैं। यह राष्ट्रविरोधी मानसिकता लोकतांत्रिक मर्यादाओं के बिल्कुल खिलाफ है।”
उन्होंने आह्वान किया कि राजनीतिक मतभेदों को कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा, अखंडता और देशहित के आड़े नहीं आने देना चाहिए।
गैर-मान्यता प्राप्त और कागजी मदरसों पर एक्शन: ‘बंद करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं’
भाषण के दौरान जब राज्य के स्कूली ढांचे और मदरसों की स्थिति का जिक्र आया, तो शिक्षा मंत्री ने प्रशासनिक कड़ाई के स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग पूरे राज्य में उन सभी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों का व्यापक ऑडिट और सर्वे कर रहा है, जिनकी उपयोगिता और कार्यप्रणाली संदिग्ध है। सरकार उन सभी संभावनाओं की समीक्षा कर रही है जहां छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
मदरसों को लेकर रुख स्पष्ट करते हुए उन्होंने दो-टूक कहा:
“हम उन सभी स्कूलों और संस्थानों की बारीकी से जांच कर रहे हैं। साफ नियम है कि जिन मदरसों के पास अनिवार्य इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, जहां शिक्षकों और छात्रों की जरूरी सुविधाएं नदारद हैं, जो किसी भी सक्षम बोर्ड से मान्यता-प्राप्त नहीं हैं और जो केवल सरकारी अनुदान या कागजों पर अस्तित्व में दिखाए जा रहे हैं, उन्हें पूरी तरह से बंद कर दिया जाना चाहिए। बच्चों को अंधकार में धकेलने वाले ऐसे फर्जी संस्थानों के लिए राज्य की व्यवस्था में कोई जगह नहीं हो सकती।”
उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को आधुनिक शिक्षा, कंप्यूटर, विज्ञान और मुख्यधारा के विषयों से जोड़ना है, न कि उन्हें बिना मान्यता वाली अव्यवस्थित व्यवस्था में छोड़ देना।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार या सियासी ध्रुवीकरण? गरमाई बंगाल की राजनीति
शिक्षा मंत्री के इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। विपक्षी दलों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने मंत्री की इस टिप्पणी पर ऐतराज जताते हुए आरोप लगाया है कि वास्तविक प्रशासनिक मुद्दों, शिक्षकों की भर्ती और स्कूलों की बुनियादी बदहाली से ध्यान भटकाने के लिए ‘दिमागी नक्सल’ और ‘मदरसा बंदी’ जैसे भावनात्मक और विभाजनकारी शब्दों का सहारा लिया जा रहा है। वहीं, राष्ट्रवादी विचारकों और समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में अलगाववादी सोच पर लगाम लगाना और फर्जी गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की वित्तीय व प्रशासनिक जांच करना राष्ट्रीय सुरक्षा और छात्रों के बेहतर भविष्य दोनों के लिए समय की सबसे बड़ी मांग है। बहरहाल, शिक्षा मंत्री के इस कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में बंगाल की शिक्षा नीति और अवैध संस्थानों की पड़ताल को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कार्रवाइयां देखने को मिल सकती हैं।
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