कोडीन कफ सिरप पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: चिकित्सीय इस्तेमाल पर नहीं लगेगा NDPS एक्ट, दवा और नशे के बीच खिंची कानूनी लक्ष्मण रेखा

उत्तर प्रदेश की न्यायिक राजधानी प्रयागराज स्थित इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कोडीन युक्त कफ सिरप के निर्माण, भंडारण, परिवहन और खुदरा बिक्री को लेकर एक युगांतरकारी और ऐतिहासिक कानूनी फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने दो टूक व्यवस्था दी है कि यदि कोडीन आधारित कफ सिरप का निर्माण, स्टॉक या बिक्री निर्धारित कानूनी सीमा के भीतर विशुद्ध रूप से चिकित्सीय (दवा) प्रयोजनों के लिए की जा रही है, तो उस पर स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम यानी एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के कठोर प्रावधान लागू नहीं होंगे। हालांकि, अदालत ने इसके साथ ही यह भी सख्त चेतावनी दी है कि यदि इसी कफ सिरप को दवा की आड़ में नशे के उद्देश्य से डायवर्ट किया जाता है या फर्जी फर्मों और बोगस बिलों के जरिए तस्करी सिंडिकेट को बेचा जाता है, तो यह कृत्य सीधे तौर पर एनडीपीएस कानून के तहत गैर-जमानती अपराध माना जाएगा।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने कोडीन कफ सिरप के मामलों में राज्यभर से दाखिल लगभग 80 जमानत याचिकाओं पर एक साथ विस्तृत सुनवाई करते हुए यह मील का पत्थर निर्णय सुनाया है। यह आदेश उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, उन्नाव, प्रयागराज, वाराणसी, गोरखपुर, मेरठ, आगरा और गाजियाबाद सहित पूरे राज्य के दवा कारोबारियों, खुदरा मेडिकल स्टोर संचालकों, ट्रांसपोर्टरों और कानूनी हलकों में लंबे समय से बने संशय को समाप्त करने वाला साबित हुआ है। अब तक ड्रग इंस्पेक्टरों और पुलिस द्वारा मेडिकल स्टोरों पर नियमित जांच के दौरान मामूली कागजी विसंगतियों या बिना पर्ची के एकाध बोतल सिरप की बिक्री पाए जाने पर भी सीधे एनडीपीएस एक्ट की गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दिया जाता था, जिससे दवा व्यापारियों में भारी भय का वातावरण बना हुआ था। हाईकोर्ट के इस फैसले ने अब दवा और नशे के बीच की कानूनी सीमा रेखा को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।

चिकित्सीय उपयोग पर NDPS नहीं: हाईकोर्ट ने तय की दवा और नशे की कानूनी लक्ष्मण रेखा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा 14 नवंबर 1985 को जारी की गई अधिसूचना की प्रविष्टि 35 (Entry 35) का गहन विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि कोडीन फॉस्फेट से युक्त कफ सिरप (जैसे फेंसिडिल, एस्कफ, कोरेक्स आदि) यदि प्रति खुराक 100 मिलीग्राम से कम या 0.2 प्रतिशत की निर्धारित सीमा के भीतर तैयार किए गए हैं, तो वे प्राथमिक तौर पर एक औषधि हैं। जब तक यह दवा किसी मरीज की खांसी या सांस संबंधी बीमारी के उपचार के लिए वैध मेडिकल चैनलों के जरिए बेची जा रही है, तब तक इसे एनडीपीएस कानून की धारा 2(xi) के तहत ‘निर्मित नशीला पदार्थ’ (Manufactured Drug) नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि संसद का इरादा जीवनरक्षक और दर्द निवारक दवाओं के वैध व्यापार को बाधित करना कभी नहीं था। लेकिन जैसे ही इन वैध कफ सिरपों को चिकित्सा के दायरे से बाहर निकालकर नशेड़ियों को ऊंचे दामों पर बेचने, सीमावर्ती राज्यों या पड़ोसी देशों जैसे बांग्लादेश और नेपाल में तस्करी करने के लिए भेजा जाता है, उसी क्षण यह दवा अपनी वैधानिक छूट खो देती है। अदालत ने साफ शब्दों में रेखांकित किया कि दवा के रूप में निर्मित किसी उत्पाद का उद्देश्य यदि नशाखोरी को बढ़ावा देना बन जाए, तो कानून उसे साधारण दवा नहीं बल्कि प्रतिबंधित मादक पदार्थ के रूप में ही देखेगा और उसके खिलाफ एनडीपीएस कानून का शिकंजा पूरी सख्ती से कसा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट के ‘हीरा सिंह’ फैसले की नजीर: तस्करी में पूरी बोतल का वजन माना जाएगा

फैसले में एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु पर विचार करते हुए अदालत ने उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक ‘हीरा सिंह बनाम भारत संघ’ मामले के सिद्धांत को पूरी तरह दोहराया। अक्सर तस्कर और उनके अधिवक्ता यह दलील देते हैं कि कफ सिरप की 100 मिलीलीटर की बोतल में कोडीन की वास्तविक मात्रा केवल कुछ मिलीग्राम ही होती है, इसलिए बरामद माल को एनडीपीएस की ‘व्यावसायिक मात्रा’ (Commercial Quantity) नहीं माना जाना चाहिए। इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी कफ सिरप की खेप को अवैध तस्करी या नशे के लिए पकड़ा जाएगा, तो उसमें केवल शुद्ध कोडीन का वजन नहीं तोला जाएगा, बल्कि सिरप के पूरे तरल मिश्रण (Neutral Substance) का कुल वजन गिना जाएगा।

एनडीपीएस अधिनियम की अनुसूची के अनुसार कोडीन या उसके मिश्रण की 1 किलोग्राम से अधिक की मात्रा को व्यावसायिक श्रेणी में रखा गया है। इसका सीधा व्यावहारिक अर्थ यह है कि यदि किसी गैर-कानूनी खेप में कफ सिरप की 10 या 12 से अधिक बोतलें बरामद होती हैं, तो उनका कुल वजन आसानी से एक किलोग्राम के पार निकल जाता है। ऐसे में आरोपी पर एनडीपीएस एक्ट की धारा 21(सी) और धारा 37 के सबसे कड़े प्रतिबंध स्वतः लागू हो जाएंगे, जिसके तहत अदालत से नियमित जमानत मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

ड्रग इंस्पेक्टर्स की मनमानी पर लगाम: मामूली खामियों पर सीधे NDPS की FIR दर्ज नहीं होगी

इस फैसले का सबसे मानवीय और व्यावहारिक पहलू छोटे दवा विक्रेताओं (Retail Chemists) को मिलने वाली सुरक्षा से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि औषधि निरीक्षक (ड्रग इंस्पेक्टर) मेडिकल स्टोरों पर नियमित निरीक्षण के दौरान छोटी-मोटी कमियां दिखने पर या किसी ग्राहक को डॉक्टर के पर्चे (Prescription) के बिना एक-दो बोतल कफ सिरप बेचे जाने पर भी सीधे एनडीपीएस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करा देते थे।

न्यायमूर्ति देशवाल ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि यदि कोई लाइसेंसधारी खुदरा विक्रेता अपने नियमित व्यापार के दौरान बिना डॉक्टर के पर्चे के मामूली मात्रा में कफ सिरप बेचता है, तो यह केवल ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940’ के नियमों का उल्लंघन माना जाएगा, न कि एनडीपीएस कानून का अपराध। इसके लिए विक्रेता का लाइसेंस निलंबित किया जा सकता है या ड्रग्स एक्ट के तहत चालान किया जा सकता है, लेकिन उसे सीधे नारकोटिक्स तस्कर बनाकर जेल नहीं भेजा जा सकता। हां, यदि कोई मेडिकल स्टोर संचालक बहुत कम समय के भीतर असामान्य रूप से हजारों बोतलों की बिक्री बिना किसी वैध बिल या मरीज के रिकॉर्ड के करता पाया जाता है, तो यह माना जाएगा कि वह नशे के नेटवर्क का हिस्सा है और तब उस पर एनडीपीएस लगेगा। इसी के साथ हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) के आयुक्त को कड़े प्रशासनिक निर्देश जारी किए कि वे सभी जिलों के ड्रग इंस्पेक्टरों को सर्कुलर भेजें कि मेडिकल स्टोरों पर कमियां पाए जाने पर सीधे एनडीपीएस का केस दर्ज करने से पहले संबंधित सरकारी अधिवक्ता (डीजीसी क्रिमिनल) से कानूनी राय लेना अनिवार्य करें।

60 से अधिक आरोपियों पर फैसला: ड्राइवर और खलासी को जमानत, सिंडिकेट के सरगनाओं को झटका

हाईकोर्ट ने 80 याचिकाओं का निस्तारण करते हुए वास्तविक अपराधियों और अनजाने में फंसे लोगों के बीच बड़ा फर्क किया। अदालत ने उन 60 से अधिक ट्रक चालकों, खलासियों, लोडिंग सहायकों और छोटे दुकानदारों को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, जिनकी भूमिका केवल सीलबंद कार्टन ढोने तक सीमित थी या जिन्हें इस बात की कोई पुख्ता जानकारी (Conscious Possession) नहीं थी कि पार्सल के भीतर प्रतिबंधित सिरप छिपाकर ले जाया जा रहा है। अदालत ने माना कि आजीविका के लिए गाड़ी चलाने वाले निर्दोष कर्मियों को बिना ठोस सबूत के महीनों तक सलाखों के पीछे रखना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

दूसरी तरफ, अदालत ने अंतरराज्यीय तस्करी सिंडिकेट के 14 से 19 मुख्य सरगनाओं, सुपर-स्टॉकिस्टों और हवाला ऑपरेटरों की जमानत याचिकाएं पूरी सख्ती से खारिज कर दीं। इनमें शैली ट्रेडर्स के भोला प्रसाद, डीएसए फार्मा के दिवेश जायसवाल, महाकाल मेडिकल के अंकुश सिंह, अभिनव कुमार यादव, बादल आर्य और हर्ष अग्रवाल जैसे बड़े नाम शामिल हैं। जांच एजेंसियों के डिजिटल साक्ष्यों, बैंक लेन-देन, फास्टैग टोल प्लाजा की ट्रैकिंग और जीएसटी पोर्टल के विश्लेषण से यह साबित हुआ कि इन लोगों ने कागजों पर फर्जी फर्में बनाकर और करोड़ों रुपये के जाली ई-वे बिल जारी करके 7.5 लाख से अधिक कफ सिरप की बोतलों को खुले बाजार और पूर्वोत्तर राज्यों में नशे के अवैध धंधे में झोंका था। अदालत ने साफ कहा कि समाज की युवा पीढ़ी की नसों में धीमा जहर घोलने वाले ऐसे संगठित तस्कर किसी भी प्रकार की न्यायिक राहत के हकदार नहीं हैं।

दवा व्यापारियों को बड़ी राहत: ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट और NDPS कानून के बीच अंतर हुआ स्पष्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय से उत्तर प्रदेश के लाखों केमिस्टों और फार्मा डिस्ट्रीब्यूटर्स ने बड़ी राहत की सांस ली है। राज्य के विभिन्न केमिस्ट एसोसिएशन लंबे समय से यह मांग कर रहे थे कि पुलिस और औषधि प्रशासन द्वारा सामान्य तकनीकी खामियों को एनडीपीएस जैसा संगीन अपराध बनाकर ईमानदार व्यापारियों का उत्पीड़न बंद किया जाए। हाईकोर्ट के इस फैसले ने दोनों कानूनों के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह पारदर्शी बना दिया है।

अब नियम यह रहेगा कि सामान्य व्यापारिक कमियों, जैसे एक्सपायरी दवाओं का उचित रिकॉर्ड न होना, स्टॉक रजिस्टर में हल्की विसंगति या पर्चे के रख-रखाव में चूक के मामलों का निपटारा केवल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की सुसंगत धाराओं के तहत ही होगा। एनडीपीएस एक्ट केवल तभी लागू किया जा सकेगा जब जांच एजेंसी के पास यह साबित करने के लिए पुख्ता इलेक्ट्रॉनिक, वित्तीय या भौतिक साक्ष्य होंगे कि कफ सिरप की खेप को इलाज के लिए नहीं, बल्कि नशे और अवैध तस्करी के उद्देश्य से बाजार में उतारा गया था। इस ऐतिहासिक फैसले से जहां एक ओर निर्दोष दवा व्यापारियों को प्रशासनिक भय और मनमानी से मुक्ति मिलेगी, वहीं दूसरी ओर असली नशा तस्करों के खिलाफ कानून का फंदा और अधिक कस सकेगा।

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