कोर्ट परिसर में वकीलों की गुंडागर्दी पर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार: दिल्ली के वकीलों की पिटाई मामले में अब UP इंटेलिजेंस करेगा सीक्रेट जांच

न्याय के सबसे बड़े मंदिर कहे जाने वाले न्यायालय परिसर में जब कानून के रखवाले ही कानून को हाथ में ले लें, तो न्यायपालिका की साख पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कैसरबाग स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में घटी एक सनसनीखेज वारदात ने पूरे देश के कानूनी गलियारों को झकझोर कर रख दिया है। दिल्ली से एक मुकदमे की पैरवी करने लखनऊ पहुंचे तीन वरिष्ठ अधिवक्ताओं (जिनमें दो महिला वकील भी शामिल थीं) और उनके मुवक्किल के साथ स्थानीय वकीलों द्वारा की गई बर्बर मारपीट, गाली-गलौज और जानलेवा हमले के मामले में अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बेहद सख्त रुख अख्तियार कर लिया है।

अदालत परिसर के भीतर न्यायिक कार्यवाही को बंधक बनाने और खुलेआम गुंडागर्दी करने की इस घटना पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने पहले केंद्रीय खुफिया एजेंसी आईबी (Intelligence Bureau) को आरोपी वकीलों के पूरे सिंडिकेट और उनकी गतिविधियों की गुप्त जांच का जिम्मा सौंपा था। लेकिन अब अदालत ने अपने पूर्व के आदेश में बड़ा और महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए इस हाई-प्रोफाइल मामले की कमान उत्तर प्रदेश पुलिस के खुफिया विभाग (UP Police Intelligence Department) को सौंप दी है। हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अदालत परिसरों को असामाजिक तत्वों का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाएगा और काले कोट की आड़ में आपराधिक गतिविधियां चलाने वालों से कानून पूरी सख्ती से निपटेगा।

आईबी ने जांच से क्यों खींचे हाथ? डिप्टी सॉलिसिटर जनरल की दलील पर बदला आदेश

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा कानूनी मोड़ तब आया जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए डिप्टी सॉलिसिटर जनरल एस. बी. पांडेय ने अदालत के सामने आईबी के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण दलीलें पेश कीं। हाईकोर्ट ने अपने 28 जुलाई के आदेश में खुफिया ब्यूरो (IB) के संयुक्त निदेशक (Joint Director) स्तर के अधिकारी को यह निर्देश दिया था कि वह आरोपी वकीलों के आपराधिक इतिहास, जमीनों पर अवैध कब्जों और उनके सिंडिकेट की सीक्रेट जांच कर सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट पेश करे।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि भारत सरकार के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की कार्यप्रणाली, उद्देश्य और कार्यक्षेत्र पूरी तरह अलग हैं। आईबी मूल रूप से देश की आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद निरोधक अभियानों, सीमा पार से होने वाली जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत गोपनीय रणनीतिक मामलों पर काम करती है। किसी राज्य के स्थानीय न्यायालय परिसर में वकीलों के बीच हुई मारपीट, संपत्ति विवाद या स्थानीय अपराध की पड़ताल करना आईबी के वैधानिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से पूरी तरह बाहर है।

न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की इस व्यावहारिक और कानूनी दलील को पूरी तरह तर्कसंगत माना। पीठ ने दर्ज किया कि आईबी के कार्य की प्रकृति को देखते हुए उससे स्थानीय स्तर पर यह जांच कराना उपयुक्त नहीं होगा। इसी आधार पर खंडपीठ ने अपने पुराने आदेश के संबंधित पैराग्राफ को संशोधित करते हुए आईबी से जांच वापस ले ली और स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था संभालने वाली राज्य की सर्वोच्च खुफिया एजेंसी को यह दायित्व सौंप दिया।

अब यूपी पुलिस का इंटेलिजेंस विभाग करेगा सीक्रेट ऑपरेशन: डीजी को बनाया गया पक्षकार

हाईकोर्ट ने अपने संशोधित आदेश में यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब आरोपी स्थानीय वकीलों की आपराधिक पृष्ठभूमि, उनकी संदिग्ध गतिविधियों और उनके आर्थिक स्रोतों की गहन और गोपनीय जांच उत्तर प्रदेश पुलिस का इंटेलिजेंस विभाग करेगा। इस जांच की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अदालत ने इसे किसी निचले स्तर के अधिकारी को सौंपने के बजाय सीधे पुलिस महानिदेशक (डीजी इंटेलिजेंस) की सीधी निगरानी में कराने का हुक्म दिया है।

अदालत ने इस जनहित याचिका की कार्यवाही में पुलिस महानिदेशक (अभिसूचना/इंटेलिजेंस), लखनऊ को औपचारिक रूप से एक विपक्षी पक्षकार (Opposite Party) बनाने का निर्देश जारी किया है। पीठ ने कोर्ट में मौजूद शासकीय अधिवक्ता डॉ. वी. के. सिंह को निर्देशित किया कि वे आदेश की आधिकारिक प्रति तत्काल डीजी इंटेलिजेंस को प्रेषित करें, ताकि जांच प्रक्रिया में एक पल की भी देरी न हो। इंटेलिजेंस विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह आरोपियों के खिलाफ दर्ज पुराने मुकदमों, न्यायालय में उनके व्यवहार और जमीन खरीद-फरोख्त से जुड़े मामलों का पूरा कच्चा-चिट्ठा तैयार कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे। मामले की अगली निर्णायक सुनवाई अब 15 सितंबर को नियत की गई है।

10 साल का इनकम टैक्स रिटर्न और करोड़ों की संपत्ति का हिसाब: नपेंगे ‘काली भेड़’ बने वकील

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में जो कड़ा रुख अपनाया है, उसने अदालत परिसर में समानांतर सत्ता चलाने वाले तत्वों के पसीने छुड़ा दिए हैं। अदालत ने मुख्य रूप से चिन्हित किए गए चार प्रमुख वकीलों— सौरभ कुमार वर्मा, हर्षित पांडे, यश पांडे और अभय प्रताप वर्मा के लखनऊ के किसी भी अदालत परिसर में प्रवेश करने पर पहले ही पूर्ण अंतरिम प्रतिबंध लगा रखा है। इसके साथ ही, खंडपीठ ने इन वकीलों को पिछले 10 वर्षों के अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR), चल-अचल संपत्तियों, बैंक खातों, व्यावसायिक हितों और पारिवारिक संपत्ति लेनदेन का पूरा ब्योरा शपथपत्र के माध्यम से दाखिल करने का आदेश दिया था।

हालिया सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने इस बात पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की कि बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद संबंधित वकीलों ने अभी तक अपनी संपत्तियों और आयकर से जुड़े जरूरी हलफनामे रिकॉर्ड पर दाखिल नहीं किए हैं। अदालत ने बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनी पेशे में अधिकांश वकील पूरी ईमानदारी, गरिमा और निष्ठा के साथ अपने पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करते हैं, लेकिन कुछ “काली भेड़ें” (Black Sheep) वकालत के पवित्र पेशे और काले कोट की आड़ में अदालत परिसरों को बदनाम करने पर तुली हैं। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा, “हमें इन काली भेड़ों की पहचान कर उन्हें जल्द से जल्द जवाबदेह बनाना होगा। जो लोग अदालत परिसर के अंदर या बाहर शांतिपूर्ण माहौल बिगाड़ने पर आमादा हैं, उनके खिलाफ ऐसी सख्त कार्रवाई होगी जो एक नजीर बने।”

कैसरबाग कोर्ट में असलहा, धमकी और चेंबर में घसीटने का आरोप: क्या था 21 जुलाई का पूरा विवाद?

यह पूरा विवाद 21 जुलाई 2026 को लखनऊ की जिला अदालत में उस वक्त भड़का, जब दिल्ली से आए तीन वकील अभिप्स मोहंती, कोमल अग्रवाल और आशुतोष श्रीवास्तव अपने मुवक्किल मोहम्मद शाकिर के साथ एक सिविल मुकदमे (सूट नंबर 2933/2025) की पैरवी करने अदालत पहुंचे थे। आरोप है कि जैसे ही वे अदालत कक्ष के आसपास पहुंचे, स्थानीय वकील सौरभ कुमार वर्मा (जो कि उस समय सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के जूनियर वाइस-प्रेसिडेंट पद पर भी काबिज थे) और उनके दर्जनों सहयोगियों ने उन्हें घेर लिया।

पीड़ित पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने दिल्ली से आई महिला वकीलों के साथ भयंकर अभद्रता और गाली-गलौज की, वकालतनामे और केस डायरी को छीनकर फाड़ दिया और न्यायिक कार्यवाही में जबरन व्यवधान डाला। वादी मोहम्मद शाकिर को बेरहमी से पीटा गया और उसे घसीटते हुए सेंट्रल बार एसोसिएशन के दफ्तर में ले जाया गया, जहां उसे केस वापस न लेने पर जान से मारने की सीधी धमकी दी गई।

इतना ही नहीं, हाईकोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर रोते हुए शाकिर ने यह भी आरोप लगाया कि हमलावर वकील के पास अवैध असलहा था, जिसे उसके हाथ में थमाकर फर्जी मुकदमे में फंसाने की साजिश रची जा रही थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए वजीरगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जिला जज और पुलिस कमिश्नर द्वारा सीलबंद लिफाफे में सौंपी गई सीसीटीवी फुटेज और प्राथमिक रिपोर्ट में भी वादी के साथ हुई शारीरिक हिंसा और आरोपियों की संलिप्तता की पुष्टि हुई है।

अदालत परिसर में गुंडागर्दी पर जीरो टॉलरेंस: न्यायपालिका की साख बचाने की निर्णायक जंग

हाईकोर्ट ने इस मामले में यह भी रेखांकित किया है कि यदि जांच में संगठित गिरोह बनाकर मुकदमेबाजी को प्रभावित करने, जमीन हड़पने या पक्षकारों और बाहरी वकीलों को डराने-धमकाने के साक्ष्य मिलते हैं, तो पुलिस को नए आपराधिक कानून ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) की धारा 111 (संगठित अपराध/Organised Crime) के तहत भी कठोर कार्रवाई पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही पीड़ित वादी और महिला वकीलों को पूरी पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने के आदेश दिए गए हैं।

अदालत का यह सख्त रुख देश भर के न्यायालय परिसरों के लिए एक कड़ा संदेश है कि अदालतों को किसी भी स्थिति में दबंगई या बाहुबल के हवाले नहीं किया जा सकता। न्याय मांगने आने वाले आम नागरिक और दूर-दराज से आने वाले अधिवक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य और न्यायपालिका की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अब जब राज्य की इंटेलिजेंस विंग इस मामले की तह तक जाकर परतें खोलने में जुटी है, तो यह तय माना जा रहा है कि 15 सितंबर को होने वाली अगली सुनवाई में कई रसूखदार चेहरों के नकाब उतरने वाले हैं।

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