क्या अब पासपोर्ट से होगी वोटरों की जांच? ट्रंप प्रशासन ने तैयार किया चुनावी डेटा का नया प्लान; गैर-नागरिक वोटिंग रोकने के नाम पर उठे सवाल

अमेरिका की चुनावी प्रणाली, मतदाता सूची (Voter Rolls) और नागरिकता सत्यापन को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एक बेहद बड़ा और दूरगामी कदम उठाने की तैयारी कर ली है। चुनाव में कथित ‘गैर-नागरिकों के फर्जी मतदान’ (Noncitizen Voting) को रोकने की आड़ में अब ट्रंप सरकार सीधे विदेश मंत्रालय (US Department of State) के आधिकारिक पासपोर्ट रिकॉर्ड्स को खंगालने जा रही है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) द्वारा वाशिंगटन की एक संघीय अदालत में पेश की गई ताजा स्टेटस रिपोर्ट से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि प्रशासन पासपोर्ट डेटाबेस को अन्य केंद्रीय एजेंसियों और राज्यों के साथ साझा करने का एक नया संघीय नियम लाने वाला है। इस कदम के तहत अमेरिकी नागरिकता साबित करने और वोटरों की पात्रता जांचने के लिए पासपोर्ट सेवाओं से जुड़े व्यक्तिगत रिकॉर्ड्स को आधार बनाया जाएगा। इस योजना के सामने आते ही अमेरिका के मानवाधिकार संगठनों, कानूनी पैरोकारों और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच हड़कंप मच गया है।

कोर्ट फाइलिंग से खुला राज: साझा होगा पासपोर्ट का निजी डेटा

अदालत में दायर रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्रालय जल्द ही फेडरल रजिस्टर में एक औपचारिक नोटिस जारी करने की योजना बना रहा है। इसके तहत ‘पासपोर्ट सर्विसेज रिकॉर्ड्स सिस्टम’ (Passport Services Records System) में दर्ज सभी जानकारियों को संघीय सरकार के वेरिफिकेशन प्लेटफॉर्म्स के साथ साझा करने की अनुमति दी जाएगी।

इस डेटा का प्राथमिक उद्देश्य मतदाताओं की नागरिकता और वोट डालने की वैधता का मिलान करना होगा। इसका सीधा असर उन करोड़ों आम अमेरिकी नागरिकों पर पड़ेगा जिन्होंने कभी भी अमेरिकी पासपोर्ट के लिए आवेदन किया है, क्योंकि उनका निजी और संवेदनशील डेटा सीधे तौर पर केंद्रीय जांच और मतदाता समीक्षा की पहुंच में आ जाएगा।

सोशल सिक्योरिटी और होमलैंड सिक्योरिटी के बाद अब पासपोर्ट का दांव

ट्रंप प्रशासन इससे पहले सोशल सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन (SSA) और डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) के डेटाबेस के जरिए राज्यों की वोटर लिस्ट से संदिग्ध गैर-नागरिकों को छांटने की कोशिश कर चुका है। हालांकि, अदालती चुनौतियों और कानूनी पेंचों के कारण उन प्रयासों को बार-बार झटके लगे हैं।

अब प्रशासन ने सीधे पासपोर्ट डेटाबेस की ओर रुख किया है, क्योंकि पासपोर्ट को अमेरिका में नागरिकता का सबसे पुख्ता और आधिकारिक दस्तावेज माना जाता है। रिपब्लिकन पार्टी और ट्रंप समर्थकों का लंबे समय से दावा रहा है कि अमेरिकी चुनावों में अवैध अप्रवासी और गैर-नागरिक वोट डालते हैं, जिससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित होती है। इसलिए वे ‘सेव अमेरिका एक्ट’ (SAVE Act) जैसे कड़े कानूनों के जरिए वोटर रजिस्ट्रेशन के समय पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेजी प्रमाण दिखाना अनिवार्य करने पर जोर दे रहे हैं।

प्राइवेसी और वोटरों के अधिकार पर गहराया संकट

ट्रंप प्रशासन के इस प्लान के सामने आते ही मानवाधिकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे ‘वोटर दमन’ (Voter Suppression) का खतरनाक हथियार करार दिया है। कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि 1974 के प्राइवेसी एक्ट के तहत नागरिकों के निजी पहचान संबंधी डेटा को बिना ठोस आधार के इस तरह अन्य एजेंसियों के साथ शेयर नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा, डेटा विश्लेषकों का कहना है कि लगभग 50 फीसदी आम अमेरिकी नागरिकों के पास वैध पासपोर्ट ही नहीं है। विशेषकर निम्न-आय वर्ग, अल्पसंख्यक और ग्रामीण इलाकों के लोगों के पास महंगे पासपोर्ट बनवाने का कोई कारण नहीं होता। ऐसे में अगर पासपोर्ट डेटाबेस से वोटर लिस्ट का मिलान किया गया और अधूरी जानकारी के आधार पर नाम काटे गए, तो लाखों वैध और पात्र अमेरिकी नागरिक मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।

आगामी चुनावों से पहले अमेरिका में कानूनी जंग तेज

यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका में आगामी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों की सरगर्मियां तेज हैं। कैलिफोर्निया सहित कई डेमोक्रेटिक शासित राज्यों ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने मतदाताओं की निजी जानकारी या वोटर रोल को केंद्रीय एजेंसियों के हवाले नहीं करेंगे और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करेंगे।

नागरिक अधिकार वकीलों ने चेतावनी दी है कि जैसे ही विदेश मंत्रालय इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी करेगा, इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी। बहरहाल, ट्रंप प्रशासन की इस नई रणनीति ने साफ कर दिया है कि अमेरिकी चुनावों में वोटिंग अधिकार और नागरिकता सत्यापन का मुद्दा आने वाले महीनों में अदालत से लेकर संसद तक सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बनने वाला है।

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