‘क्या आप US से हथियार खरीदेंगे?’ शी जिनपिंग को डोनाल्ड ट्रंप का सनसनीखेज सवाल; ताइवान से पेंटागन तक मची खलबली

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रक्षा सौदों के इतिहास में एक ऐसा चौंकाने वाला वाकया सामने आया है जिसने दुनिया भर के सुरक्षा विश्लेषकों और रणनीतिकारों के कान खड़े कर दिए हैं। अमेरिका और चीन के बीच ताइवान को हथियारों की बिक्री को लेकर दशकों से तनातनी चली आ रही है। इसी गरमा-गरम विवाद के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने एक ऐसा सवाल उछाल दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। चीन में अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू के हालिया खुलासे के मुताबिक, ट्रंप ने बातचीत के दौरान शी जिनपिंग से सीधा पूछ लिया था कि क्या चीन भी अमेरिका से उन्नत हथियार खरीदना चाहेगा। ट्रंप का यह रुख ताइवान को हथियार बेचने के अपने फैसले का बचाव करने और बातचीत के तनाव को हल्का करने के अंदाज में सामने आया था। हालांकि, इस एक सवाल ने ताइवान से लेकर वाशिंगटन के रक्षा गलियारों तक गहरी बेचैनी और तनाव पैदा कर दिया है।

‘हम दूसरों को भी बेचते हैं, क्या आप लेंगे?’: राजदूत का सनसनीखेज खुलासा

चीन में अमेरिकी राजदूत डेविड परड्यू ने एक साक्षात्कार में इस बेहद संवेदनशील बातचीत का ब्योरा दिया। परड्यू के अनुसार, जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ताइवान को अत्याधुनिक अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे चीन की संप्रभुता के खिलाफ बताया, तो ट्रंप ने अपने जाने-पहचाने कारोबारी अंदाज में जवाब दिया। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका पूरी दुनिया में अपने सहयोगियों और विभिन्न देशों को हथियार बेचता है, यह उनका एक सामान्य रक्षा कारोबार है। इसके तुरंत बाद ट्रंप ने जिनपिंग से पूछ लिया, “क्या आप भी कुछ अमेरिकी हथियार खरीदना चाहेंगे?” हालांकि बाद में व्हाइट हाउस और अमेरिकी विदेश विभाग ने यह स्पष्ट करते हुए डैमेज कंट्रोल की कोशिश की कि चीन को हथियार बेचने की कोई योजना या प्रस्ताव नहीं है और अमेरिकी कानून भी ऐसा करने पर रोक लगाते हैं, लेकिन ट्रंप के इस अनपेक्षित सवाल ने वैश्विक कूटनीति के पन्नों में नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

ताइवान सबसे ज्यादा टेंशन में, सुरक्षा गारंटी पर मंडराए संशय के बादल

ट्रंप के इस ऑफर के सामने आते ही सबसे गहरा झटका और तनाव ताइवान (ताइपे) को लगा है। ताइवान अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिकी सैन्य साजो-सामान, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और लड़ाकू विमानों पर निर्भर है। ताइवान की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि अमेरिकी नेतृत्व हथियारों की आपूर्ति को केवल एक व्यावसायिक मुनाफे (डीलमेकिंग) के चश्मे से देखता है, तो भविष्य में रणनीतिक सुरक्षा गारंटी कमजोर पड़ सकती है। ताइपे के रक्षा हलकों में इस बात का डर सता रहा है कि क्या ताइवान जलडमरूमध्य (Taiwan Strait) में शक्ति संतुलन केवल किसी व्यापारिक सौदेबाजी की भेंट चढ़ सकता है? ताइवान की राष्ट्रपति और सुरक्षा एजेंसियां इस बात को लेकर सतर्क हो गई हैं कि बीजिंग और वाशिंगटन के बीच रिश्तों को स्थिर करने की किसी भी नई कोशिश का खमियाजा ताइवान को न भुगतना पड़े।

पेंटागन और अमेरिकी रणनीतिकारों के छूटे पसीने: तकनीक लीक होने का बड़ा जोखिम

इस खबर ने अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की नींद उड़ा दी है। शीत युद्ध के बाद से और विशेष रूप से 1989 के बाद, अमेरिकी कानून किसी भी प्रकार की संवेदनशील रक्षा तकनीक या हथियारों की बिक्री कम्युनिस्ट चीन को करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हैं। अमेरिकी सुरक्षा रणनीतिकारों का मानना है कि यदि चीन को अमेरिकी हथियारों के बाजार में थोड़ी भी पहुंच दी जाती है, तो यह अमेरिका की दशकों पुरानी विदेश नीति को पूरी तरह उलट देगा। सबसे बड़ा खतरा यह है कि चीन अमेरिकी सैन्य तकनीकों की ‘रिवर्स-इंजीनियरिंग’ कर सकता है, जिससे अमेरिका के अत्याधुनिक हथियारों के गुप्त कोड, रडार सिस्टम और साइबर रक्षा तंत्र सीधे उसके सबसे बड़े भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के सामने उजागर हो जाएंगे। यही वजह है कि वाशिंगटन के पॉलिसी मेकर्स ट्रंप के इस व्यापारिक रवैये को रणनीतिक दृष्टि से बेहद जोखिम भरा मान रहे हैं।

भारत और क्वाड (QUAD) सहयोगियों की भी पैनी नजर

ट्रंप के इस कथित ऑफर से हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र के अन्य बड़े साझेदार—विशेष रूप से भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया—भी इस घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। क्वाड समूह का मुख्य उद्देश्य हिंद-प्रशांत में चीनी विस्तारवाद और आक्रामकता को संतुलित रखना है। ऐसे में अगर अमेरिका का कोई भी राष्ट्रपति चीन के साथ रक्षा संबंधों में नरमी या हथियारों की साझेदारी जैसी बात भी मजाक या औपचारिकता में करता है, तो इससे क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच एक गलत संदेश जा सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि व्यापारिक फायदों के लिए रक्षा नीतियों के मूलभूत सिद्धांतों से समझौता करने की कोई भी झलक पूरे एशिया में सुरक्षा समीकरणों को हिला सकती है। यद्यपि आधिकारिक स्तर पर किसी सौदे की कोई संभावना नहीं है, लेकिन इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि ट्रंप का अनप्रेडिक्टेबल अंदाज वैश्विक भू-राजनीति में कभी भी तनाव का पारा चढ़ा सकता है।

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