
सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य, यज्ञ-अनुष्ठान और विशेष रूप से शारदीय नवरात्रि की पूजा का शुभारंभ ‘घटस्थापना’ यानी कलश स्थापना से होता है। कलश को केवल जल का पात्र नहीं माना जाता, बल्कि शास्त्रों में इसे संपूर्ण ब्रह्मांड, तैंतीस कोटि देवी-देवताओं और तीर्थों का साक्षात प्रतीक माना गया है। घटस्थापना के समय कलश के मुख, कंठ और नारियल पर लाल-पीले रंग का सूती रक्षासूत्र यानी ‘कलावा’ (मौली) बांधने का विशेष शास्त्रीय विधान है। कई बार लोग इसे केवल एक सामान्य कर्मकांडीय औपचारिकता मान लेते हैं, जबकि धर्मग्रंथों और वैदिक संहिताओं में कलश के कंठ पर मौली लपेटने के पीछे अत्यंत गहरा दार्शनिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रहस्य समाहित है। यह सूत्र कलश को साधारण धातु या मिट्टी के बर्तन से बदलकर एक साक्षात चैतन्य वेदी में रूपांतरित कर देता है।
त्रिदेवों और त्रिशक्तियों का साक्षात बंधन: कलावे के तीन धागों का तत्व
कलावा मूल रूप से तीन प्रमुख रंगों और धागों के मेल से निर्मित होता है, जो सृष्टि के मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते हैं। शास्त्रों के अनुसार, कलावे के तीन तार ‘त्रिदेव’ यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा ‘त्रिशक्तियां’ यानी महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली के प्रतीक माने गए हैं। जब घटस्थापना के दौरान कलश के कंठ पर कलावा लपेटा जाता है, तो यह माना जाता है कि साधक ने सृष्टि के सृजन, पालन और संहार की अधिष्ठात्री शक्तियों को एक सूत्र में बांधकर अपने पूजा स्थल पर प्रतिष्ठित कर लिया है। इसके साथ ही यह तीन मूल गुणों—सत्व, रज और तम—को संतुलित करने का भी माध्यम बनता है। कलश के कंठ पर मौली बांधने से यह भाव स्थापित होता है कि पूजा के दौरान तीनों गुणों का संतुलन बना रहे और घर में केवल सात्विक ऊर्जा का ही प्रवाह हो।
‘येन बद्धो बली राजा…’ मंत्र का संकल्प और रक्षा का अभेद्य कवच
वैदिक परंपरा में कलश पर मौली बांधते समय पुरोहित प्रसिद्ध रक्षा मंत्र का उच्चारण करते हैं:
“येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”
इस मंत्र का ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ वामन अवतार और दानवीर राजा बलि से जुड़ा है, जहां भगवान विष्णु ने राजा बलि को अमरत्व और रक्षा का वचन देकर रक्षासूत्र में बांधा था। कलश पर यह सूत्र बांधने का सीधा अर्थ ‘रक्षा कवच’ (Protective Shield) तैयार करना है। नवरात्रि के नौ दिनों तक चलने वाली अखंड साधना में किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा, तांत्रिक बाधा या बुरी दृष्टि का प्रवेश घट में न हो सके, इसके लिए कलावा एक आध्यात्मिक सुरक्षा प्राचीर का कार्य करता है। यह संकल्प दिलाता है कि कलश में स्थापित जल और देवी की दिव्य तरंगे पूरे नौ दिनों तक सुरक्षित, शांत और चैतन्य रहेंगी।
कलश के कंठ को माना जाता है भगवान शिव का स्थान
शास्त्रों में कलश के विभिन्न अंगों में देवताओं का वास बताया गया है। कलश के मुख पर भगवान विष्णु, मूल (तले) में ब्रह्मा और कंठ में भगवान शिव (रुद्र) का वास माना गया है, जबकि मध्य भाग में मातृकाओं और समस्त देवियों का निवास होता है। कंठ पर कलावा बांधने का अर्थ भगवान शिव को वंदन करना और उनके कंठ में स्थित विष को शांत रखने वाली अमृतमयी शक्ति का आवाहन करना है। जिस प्रकार भगवान शिव ने समुद्र मंथन के हलाहल को अपने कंठ में रोककर सृष्टि की रक्षा की थी, उसी प्रकार कलश के कंठ पर बंधा कलावा साधक के घर-परिवार की समस्त नकारात्मकताओं, कलह और संकटों को वहीं रोककर उन्हें शुभता में बदल देता है।
प्राणिक ऊर्जा का संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक और बायो-एनर्जी (आभा मंडल) के दृष्टिकोण से देखें तो कलश में रखा जल एक उच्च ऊर्जा अवशोषक (Energy Absorber) होता है, जो नवरात्रि के दौरान पढ़े जाने वाले दुर्गा सप्तशती के मंत्रों की ध्वनि तरंगों को सोखता है। लाल और पीला रंग सकारात्मक ऊर्जा, सूर्य और मंगल के प्रभाव को आकर्षित करने वाले प्राथमिक रंग हैं। शुद्ध सूती धागे (कलावा) में प्राकृतिक चुंबकीय व सकारात्मक तरंगों को ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता होती है। जब कलश के ऊपरी हिस्से पर कलावा कसकर बांधा जाता है, तो यह पात्र के भीतर जल और आम के पत्तों द्वारा उत्पन्न होने वाली जैव-ऊर्जा (Bio-Energy) को बिखरने से रोकता है और उसे केंद्रित रखता है। इस प्रकार कलश नौ दिनों तक पूरे वातावरण को सुगंधित, शुद्ध और सकारात्मक बनाए रखने वाले एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर की तरह काम करता है।
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