
वैश्विक वित्तीय मंच पर एक ऐसा अजीबोगरीब विरोधाभास देखने को मिला है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और अर्थशास्त्र के जानकारों को हैरान कर दिया है। जो मुल्क पिछले कई वर्षों से पाई-पाई के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के सामने कटोरा लेकर खड़ा है और जिसकी पूरी अर्थव्यवस्था मित्र देशों के रोल-ओवर कर्ज पर सांसें ले रही है, उसी पाकिस्तान को वर्ष 2027 के लिए IMF और वर्ल्ड बैंक के शक्तिशाली माने जाने वाले ‘बोर्ड ऑफ गवर्नर्स’ (Boards of Governors) का आगामी अध्यक्ष (Incoming Chair) चुन लिया गया है। 1953 के बाद यानी करीब 74 साल के लंबे अंतराल पर पाकिस्तान को यह पद सौंपा गया है। वाशिंगटन में आयोजित आईएमएफ-विश्व बैंक की सालाना बैठक के दौरान पाकिस्तान के आर्थिक मामलों के मंत्री अहद खान चीमा को इस जिम्मेदारी के लिए औपचारिक रूप से नामित किया गया। इस खबर के सामने आते ही सोशल मीडिया और वैश्विक मीडिया में व्यंग्यात्मक टिप्पणियों की बाढ़ आ गई है कि “घर में दाने नहीं हैं, लेकिन पाकिस्तान दुनिया के सबसे बड़े साहूकारों की पंचायत की अध्यक्षता करेगा।”
74 साल बाद कैसे मिला पाकिस्तान को यह पद? क्या यह रोटेशनल व्यवस्था का नतीजा है?
पाकिस्तान सरकार और उसकी आधिकारिक मशीनरी इसे बहुत बड़ी ‘राजनयिक जीत’ और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की विश्वसनीयता के तौर पर प्रचारित करने में जुटी है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इसके पीछे का गणित पूरी तरह प्रशासनिक और रोटेशनल प्रक्रिया पर टिका है। विश्व बैंक और आईएमएफ की गवर्निंग नियमावली के अनुसार, बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की अध्यक्षता किसी देश की आर्थिक संपन्नता या सैन्य ताकत के आधार पर नहीं, बल्कि सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय चक्रानुक्रम (Regional Rotation System) के तहत तय होती है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कोटे के तहत सदस्य देशों की सहमति से पाकिस्तान का नाम आगे बढ़ाया गया, क्योंकि 1953 के बाद से पाकिस्तान को यह औपचारिक अवसर नहीं मिला था। इस पद का वास्तविक स्वरूप मुख्यतः औपचारिक और प्रक्रियात्मक बैठकों की अध्यक्षता करने तक सीमित होता है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पाकिस्तान को आईएमएफ या वर्ल्ड बैंक के नीतिगत फैसलों, लोन अप्रूवल या वैश्विक वित्तीय सुधारों पर कोई वीटो पावर या विशेषाधिकार मिल गया है।
कर्ज में डूबा मुल्क: क्या हैं पाकिस्तान के खस्ताहाल आर्थिक हालात?
इस नियुक्ति के समय पाकिस्तान का जमीनी आर्थिक परिदृश्य किसी भयावह त्रासदी से कम नहीं है। पाकिस्तान इस समय आईएमएफ के 25वें बेलआउट पैकेज के सहारे अपनी डिफ़ॉल्ट (दिवालियापन) की स्थिति को टाल रहा है। देश का कुल सार्वजनिक कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 70 प्रतिशत से भी ऊपर निकल चुका है।
पाकिस्तान के वर्तमान आर्थिक हालात के मुख्य बिंदु:
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विदेशी मुद्रा भंडार की कमजोरी: स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार मुश्किल से कुछ ही हफ्तों के जरूरी आयात को कवर करने लायक है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा सऊदी अरब, यूएई और चीन के सेंट्रल बैंक डिपॉजिट्स के रूप में बंधक है।
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आसमान छूती महंगाई और बिजली संकट: पाकिस्तान में ऊर्जा की कीमतों और गैस टैरिफ में आईएमएफ की शर्तों के चलते हुई बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम नागरिकों की कमर तोड़ दी है। आटा, दाल, दूध और जीवनरक्षक दवाओं के दाम रिकॉर्ड स्तर पर हैं।
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राजकोषीय घाटा और टैक्स कलेक्शन: टैक्स सुधारों को लागू करने में शहबाज शरीफ सरकार पूरी तरह लाचार दिख रही है, जिसके चलते आईएमएफ समय-समय पर अगली लोन किस्त जारी करने से पहले कड़ी शर्तें थोप रहा है।
बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का अध्यक्ष बनने से पाकिस्तान को क्या फायदा होगा?
आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के ढांचे में ‘बोर्ड ऑफ गवर्नर्स’ सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था होती है, जिसमें सभी 190 सदस्य देशों के वित्त मंत्री या केंद्रीय बैंक के गवर्नर शामिल होते हैं। वर्ष 2027 में होने वाली वार्षिक बैठकों की अध्यक्षता करने का अर्थ है कि पाकिस्तान के मंत्री मंच पर बैठकर सत्र का संचालन करेंगे।
पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए इसका सीधा फायदा केवल घरेलू राजनीति में छवि चमकाने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देशों) की आवाज बनने का ढोंग रचने तक सीमित रहेगा। पाकिस्तान इस मंच का उपयोग विकासशील देशों के लिए कर्ज राहत (Debt Restructuring), जलवायु परिवर्तन फंड (Climate Financing) और रियायती दरों पर कर्ज की वकालत करने के लिए कर सकता है, ताकि परोक्ष रूप से वह खुद के भारी भरकम कर्जों की री-शेड्यूलिंग का रास्ता आसान कर सके।
क्या भारत या वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा इसका कोई असर?
रणनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इस नियुक्ति से भारत के हितों या वैश्विक आर्थिक नीतियों पर कोई रत्ती भर भी नकारात्मक असर नहीं पड़ने वाला है। आईएमएफ और विश्व बैंक में वास्तविक वित्तीय ताकत और वोटिंग शेयर अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और भारत जैसे मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशों के पास केंद्रित है। आईएमएफ में कोई भी बड़ा नीतिगत बदलाव या फंडिंग का फैसला 85% वोटिंग मेजॉरिटी से होता है, जहां अकेले अमेरिका के पास वीटो पावर है। पाकिस्तान की भूमिका केवल बैठक में हथौड़ा चलाने और कार्यवाही को आगे बढ़ाने वाले सभापति जैसी होगी, जो कर्जदाता संस्थाओं की नीतियों को प्रभावित करने की हैसियत नहीं रखता।
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