
आमतौर पर यह माना जाता है कि कोई भी संक्रामक बीमारी केवल कमजोर इम्युनिटी वाले बुजुर्गों, बच्चों या पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों पर ही जानलेवा असर डालती है। जब बात डेंगू वायरस की आती है, तो यह धारणा पूरी तरह गलत साबित हो जाती है। हर साल अस्पतालों के आईसीयू में ऐसे दर्जनों युवा और एथलेटिक शरीर वाले मरीज भर्ती होते हैं जो नियमित जिम जाते हैं, संतुलित आहार लेते हैं और जिनकी मेडिकल हिस्ट्री एकदम बेदाग होती है। इसके बावजूद वे डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS) या डेंगू हेमोरेजिक फीवर (DHF) जैसी अत्यंत गंभीर और जानलेवा जटिलताओं के शिकार हो जाते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि डेंगू वायरस शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ एक अनोखा और खतरनाक खेल खेलता है। इस बीमारी में कई बार जरूरत से ज्यादा आक्रामक और मजबूत इम्युनिटी ही मरीज के अपने शरीर के खिलाफ काम करने लगती है, जिसे अनदेखा करना जान पर बन आता है।
साइटोकाइन स्टॉर्म और ओवरएक्टिव इम्युनिटी: शरीर का सुरक्षा तंत्र ही बन जाता है दुश्मन
जब डेंगू का वायरस (DENV) किसी स्वस्थ और फिट व्यक्ति के रक्तप्रवाह में प्रवेश करता है, तो उसका मजबूत इम्यून सिस्टम बहुत तेजी से हरकत में आता है। कमजोर शरीर की तुलना में एक फिट इंसान की श्वेत रक्त कोशिकाएं (WBCs) वायरस को खत्म करने के लिए अत्यधिक आक्रामक रुख अपनाती हैं। इस प्रक्रिया में शरीर भारी मात्रा में ‘साइटोकाइन्स’ नामक रक्षात्मक प्रोटीन्स का स्राव कर देता है। चिकित्सा विज्ञान में इस अनियंत्रित स्थिति को ‘साइटोकाइन स्टॉर्म’ (Cytokine Storm) कहा जाता है। यह रासायनिक तूफान वायरस को मारने के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ रक्त वाहिकाओं की आंतरिक परत (Endothelium) को भी बुरी तरह नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है। इसके परिणामस्वरूप रक्त धमनियों की दीवारें छिद्रपूर्ण (Porous) हो जाती हैं और उनमें से रक्त का तरल हिस्सा यानी प्लाज्मा रिसकर पेट, फेफड़ों और ऊतकों में जमा होने लगता है। इसे ‘प्लाज्मा लीकेज’ कहते हैं, जिसके कारण रक्तचाप अचानक गिर जाता है, महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचना बंद हो जाती है और मरीज कुछ ही घंटों में मल्टी-ऑर्गन फेलियर के कगार पर पहुंच जाता है।
सेकेंडरी इन्फेक्शन का जाल और एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट (ADE)
डेंगू का एक अन्य वैज्ञानिक पहलू है जो फिट से फिट इंसान को भी असहाय बना देता है, वह है इसका सीरोटाइप सिस्टम। डेंगू वायरस के मुख्य रूप से चार प्रकार (DENV-1, DENV-2, DENV-3, DENV-4) होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को जीवन में पहले किसी एक सीरोटाइप से हल्का डेंगू हुआ हो, जिसे उसने सामान्य मौसमी फ्लू समझकर बिना जांच कराए ठीक कर लिया हो, तो उसके शरीर में उस स्ट्रेन के खिलाफ एंटीबॉडीज बन जाती हैं। जब उसी व्यक्ति को दूसरी बार किसी दूसरे सीरोटाइप का मच्छर काटता है, तो पुरानी एंटीबॉडीज नए वायरस को पूरी तरह नष्ट नहीं कर पातीं। इसके बजाय वे वायरस को कोशिकाओं के अंदर आसानी से प्रवेश कराने में एक ‘कैरियर’ का काम करने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ‘एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट’ (ADE) कहा जाता है। इस स्थिति में वायरस शरीर के भीतर लाखों की संख्या में तेजी से फैलता है और दूसरा संक्रमण पहले वाले की तुलना में दस गुना अधिक गंभीर और खतरनाक रूप ले लेता है, चाहे मरीज शारीरिक रूप से कितना भी हट्टा-कट्टा क्यों न हो।
डेंगू के तीन चरण: बुखार उतरते ही शुरू होने वाला सबसे जानलेवा ‘क्रिटिकल फेज’
डेंगू के संक्रमण को तीन चरणों में समझा जाता है- फेब्राइल फेज, क्रिटिकल फेज और रिकवरी फेज। सबसे ज्यादा गलतियां और लापरवाही दूसरे चरण में होती हैं। पहले 3 से 4 दिनों में मरीज को 103 से 104 डिग्री तक तेज बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द और तेज बदन दर्द रहता है। चौथे या पांचवें दिन जब बुखार अचानक उतर जाता है और तापमान सामान्य होने लगता है, तो मरीज और उसके परिजन यह मान लेते हैं कि बीमारी ठीक हो गई है। हकीकत यह है कि बुखार उतरने के साथ ही असली ‘क्रिटिकल फेज’ (Critical Phase) शुरू होता है, जो अगले 24 से 48 घंटे तक रहता है। इसी चरण में प्लाज्मा लीकेज, प्लेटलेट्स की तेज गिरावट, आंतरिक रक्तस्राव और हेमेटोक्रिट (रक्त का गाढ़ापन) बढ़ने का खतरा सबसे चरम पर होता है। फिट लोग अक्सर बुखार उतरते ही सामान्य कामकाज या कसरत शुरू करने की गलती कर बैठते हैं, जिससे शरीर पर दबाव बढ़ जाता है और वे अचानक गंभीर शॉक में चले जाते हैं।
अनदेखे न करें ये 6 रेड-फ्लैग संकेत: कब तुरंत अस्पताल में भर्ती होना जरूरी है?
डेंगू में केवल प्लेटलेट काउंट देखना ही काफी नहीं होता, बल्कि शरीर द्वारा दिए जाने वाले चेतावनी संकेतों (Warning Signs) पर लगातार नजर रखनी चाहिए। पहला गंभीर लक्षण है पेट में लगातार और असहनीय दर्द होना या पेट का फूलना, जो आंतरिक अंगों में प्लाज्मा लीकेज का संकेत है। दूसरा बड़ा लक्षण है लगातार उल्टियां आना; यदि मरीज 24 घंटे में तीन से चार बार से अधिक उल्टी करता है और पानी भी नहीं पचा पाता, तो यह डिहाइड्रेशन और ऑर्गन स्ट्रेस की शुरुआत है। तीसरा संकेत मसूड़ों, नाक से खून आना या उल्टी व मल में काले रंग का खून दिखना है, जो गिरते प्लेटलेट्स और लीकेज की चेतावनी है। चौथा लक्षण अत्यधिक सुस्ती, कमजोरी, बेचैनी या मानसिक भ्रम की स्थिति है, जो दिमाग तक पर्याप्त रक्त न पहुंचने के कारण होती है। पांचवां संकेत सांस लेने में कठिनाई या भारीपन महसूस होना है, जो फेफड़ों के आसपास पानी भरने (Pleural Effusion) के कारण होता है। छठा लक्षण पेशाब की मात्रा में अचानक भारी कमी आना या हाथ-पैरों का ठंडा और चिपचिपा पड़ जाना है, जो गिरते ब्लड प्रेशर की ओर इशारा करता है। इनमें से एक भी लक्षण दिखने पर बिना समय गंवाए मरीज को तत्काल अस्पताल ले जाना चाहिए।
गलत दवाओं का जानलेवा खेल: पेनकिलर्स से क्यों बढ़ जाता है इंटरनल ब्लीडिंग का खतरा?
डेंगू के दौरान बहुत से लोग शरीर दर्द और सिरदर्द से तुरंत राहत पाने के लिए मेडिकल स्टोर से बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द निवारक दवाएं (Painkillers) खरीदकर खा लेते हैं। यह कदम मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। एस्पिरिन, ब्रूफेन (आइबुप्रोफेन), डिक्लोफेनाक या नेप्रोक्सन जैसी नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं (NSAIDs) खून को पतला करने का काम करती हैं और पेट की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाती हैं। डेंगू में प्लेटलेट्स पहले से ही कम होते हैं, ऐसे में इन दवाओं का सेवन पेट और आंतों में गंभीर आंतरिक रक्तस्राव (Internal Bleeding) को ट्रिगर कर सकता है। डेंगू के बुखार और बदन दर्द के लिए सिर्फ और सिर्फ सादा पैरासिटामोल ही सुरक्षित मानी जाती है, वह भी डॉक्टर द्वारा तय की गई खुराक के अनुसार। इसके अलावा, किसी भी तथाकथित जादुई काढ़े, अत्यधिक पपीते के पत्तों के अर्क या बकरी के कच्चे दूध का अनियंत्रित सेवन करने से बचें, क्योंकि इनकी अधिकता पेट में गंभीर एसिडिटी, डायरिया और लिवर पर अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती है।
बचाव और सुरक्षित जीवनशैली: एडीज के डंक से बचने का सबसे मजबूत सुरक्षा चक्र
डेंगू का कोई विशिष्ट एंटीवायरल इलाज नहीं है, इसलिए मच्छर के काटने से बचना ही सबसे पहला और पक्का बचाव है। डेंगू फैलाने वाला एडीज इजिप्टी मच्छर साफ और ठहरे हुए पानी में पनपता है तथा यह मुख्य रूप से दिन के समय, खासकर सुबह सूर्योदय के दो घंटे बाद और शाम को सूर्यास्त से दो घंटे पहले सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है। अपने घर, बालकनी, छत पर रखे गमलों की ट्रे, पुराने टायरों, कूलर और परिंदों के सकोरों में पानी बिल्कुल जमा न होने दें और हर हफ्ते उन्हें सुखाकर साफ करें। दिन के समय बाहर निकलते समय पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें और खुले अंगों पर डीईईटी (DEET) या पिकारिडिन युक्त मॉस्किटो रिपेलेंट क्रीम का उपयोग करें। घर के अंदर खिड़कियों पर जाली लगाकर रखें और सुबह-शाम मच्छर भगाने वाले वेपोराइजर का प्रयोग करें। यदि कोई डेंगू की चपेट में आ भी जाता है, तो सबसे अहम रणनीति ओआरएस (ORS), नारियल पानी, नींबू पानी, पतली दाल और सूप के जरिए शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखना है। समय पर सीबीसी (CBC) टेस्ट कराना, शरीर को भरपूर आराम देना और लक्षणों के प्रति सतर्क रहना ही इस बीमारी से सुरक्षित बाहर निकलने का एकमात्र वैज्ञानिक मार्ग है।
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