सोते-सोते अचानक कैसे आ जाता है ‘वेक-अप स्ट्रोक’? सुबह उठते ही दिखने वाले इन 6 गंभीर लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज

रात को पूरी तरह भला-चंगा और हंसता-खेलता इंसान सोने जाता है, लेकिन सुबह जब उसकी आंख खुलती है तो शरीर का एक हिस्सा काम करना बंद कर चुका होता है या जुबान लड़खड़ाने लगती है। चिकित्सा विज्ञान में इस गंभीर और जानलेवा स्थिति को ‘वेक-अप स्ट्रोक’ (Wake-up Stroke) कहा जाता है। दुनिया भर में होने वाले कुल इस्केमिक ब्रेन स्ट्रोक के मामलों में से लगभग 20 से 25 प्रतिशत मामले नींद के दौरान ही घटित होते हैं। यह स्थिति सामान्य स्ट्रोक से कहीं अधिक खतरनाक मानी जाती है, क्योंकि जागते समय जब स्ट्रोक के लक्षण आते हैं तो मरीज या उसके परिजन तुरंत समझ जाते हैं और बिना समय गंवाए अस्पताल पहुंच जाते हैं। नींद में जब मस्तिष्क की किसी नस में खून का थक्का जम जाता है या रक्त का प्रवाह अचानक रुक जाता है, तो मरीज को इसका भान ही नहीं हो पाता। घंटों तक मस्तिष्क की संवेदनशील कोशिकाओं को ऑक्सीजन और ग्लूकोज नहीं मिल पाता, जिससे ब्रेन सेल्स तेजी से नष्ट होने लगती हैं। जब तक सुबह मरीज की नींद खुलती है या परिजन उसे जगाने जाते हैं, तब तक कीमती समय निकल चुका होता है और दिमाग का एक बड़ा हिस्सा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है।

सोते समय शरीर में ऐसा क्या होता है? जानिए स्ट्रोक आने के मुख्य जैविक कारण

अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब शरीर आराम की मुद्रा में होता है, तब दिमाग की नसें कैसे ब्लॉक हो जाती हैं। इसके पीछे हमारे शरीर का आंतरिक सर्कैडियन रिदम और रात के समय होने वाले शारीरिक बदलाव जिम्मेदार होते हैं। रात के समय जब हम गहरी नींद में होते हैं, तो हमारा रक्तचाप और हृदय गति स्वाभाविक रूप से धीमी हो जाती है। भोर के समय, यानी सुबह 3 बजे से 6 बजे के बीच, शरीर जागने की तैयारी कर रहा होता है और इसी दौरान कॉर्टिसोल व अन्य हार्मोनों का स्राव अचानक बढ़ता है, जिससे ब्लड प्रेशर में तीव्र उछाल (Morning BP Surge) आता है। रक्तचाप का यह अचानक बढ़ना मस्तिष्क की कमजोर धमनियों पर अत्यधिक दबाव डालता है। इसके अलावा, रात के दौरान लंबे समय तक पानी न पीने से शरीर में हल्का डिहाइड्रेशन हो जाता है, जिससे रक्त का गाढ़ापन बढ़ जाता है। सुबह के शुरुआती घंटों में खून के थक्के बनाने वाले प्लेटलेट्स अधिक सक्रिय और चिपचिपे हो जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति की धमनियों में पहले से ही कोलेस्ट्रॉल या प्लाक जमा है, तो गाढ़ा खून और धीमा रक्त प्रवाह मिलकर वहां आसानी से एक बड़ा थक्का (Clot) बना देते हैं, जो दिमाग तक जाने वाले खून के रास्ते को पूरी तरह बंद कर देता है।

स्लीप एपनिया और खर्राटों का जानलेवा कनेक्शन: ऑक्सीजन की कमी कैसे बनती है वजह?

सोते समय स्ट्रोक आने का एक सबसे बड़ा और अक्सर नजरअंदाज किया जाने वाला कारण ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) है। भारतीय घरों में तेज खर्राटों को अक्सर गहरी और सुकून भरी नींद की निशानी मान लिया जाता है, जबकि हकीकत में यह एक गंभीर चिकित्सीय विकार हो सकता है। स्लीप एपनिया के शिकार लोगों की सांस सोते समय बार-बार कुछ सेकंड्स के लिए पूरी तरह रुक जाती है। ऐसा गले की मांसपेशियों के ढीले पड़ने और वायुमार्ग के अवरुद्ध होने के कारण होता है। जब सांस रुकती है, तो शरीर और दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर जाता है और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। मस्तिष्क को ऑक्सीजन की कमी से बचाने के लिए हृदय को अत्यधिक तेजी से पंप करना पड़ता है, जिससे आधी रात को अचानक ब्लड प्रेशर बहुत हाई हो जाता है। यह प्रक्रिया रात भर में दर्जनों बार दोहराई जाती है, जिससे मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं को भारी नुकसान पहुंचता है। इतना ही नहीं, यह विकार दिल की धड़कन की अनियमितता यानी एट्रियल फाइब्रिलेशन (Atrial Fibrillation) को जन्म देता है, जिसमें दिल के ऊपरी कक्ष में खून का थक्का बनता है और वह सीधे दिमाग की धमनी में जाकर फंस जाता है, जिससे नींद में ही पैरालिसिस का अटैक पड़ जाता है।

सुबह सोकर उठते ही दिखने वाले 6 बड़े लक्षण, जिन्हें नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

वेक-अप स्ट्रोक की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसके शुरुआती लक्षणों को अक्सर लोग नींद का खुमार, कमजोरी या गलत करवट सोने का असर समझकर टाल देते हैं। यदि सुबह उठते ही किसी व्यक्ति के चेहरे का एक हिस्सा सुन्न लगे या मुस्कुराने पर मुंह एक तरफ झुकता हुआ दिखाई दे, तो यह स्ट्रोक का पहला स्पष्ट संकेत है। दूसरा बड़ा लक्षण है एक हाथ या एक पैर में अचानक आई कमजोरी या भारीपन; कई बार लोग सोचते हैं कि हाथ दबकर सोने की वजह से सो गया है, लेकिन यदि हाथ उठाने में असमर्थता हो या हाथ से टूथब्रश या चाय का कप छूटकर गिर जाए, तो इसे सामान्य सुन्नता कतई न समझें। तीसरा संकेत है वाणी में अस्पष्टता या लड़खड़ाहट, जहां मरीज बोलना कुछ चाहता है लेकिन उसके शब्द साफ नहीं निकलते या वह दूसरों की बात समझने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है। चौथा लक्षण है आंखों के आगे अचानक अंधेरा छा जाना, धुंधला दिखाई देना या एक ही वस्तु के दो-दो रूप (डबल विजन) नजर आना। पांचवां लक्षण शरीर के संतुलन का अचानक बिगड़ जाना है, जिससे मरीज बिस्तर से पैर नीचे रखते ही लड़खड़ाकर गिर पड़ता है या उसे भयंकर चक्कर आने लगते हैं। छठा लक्षण है बिना किसी पूर्व इतिहास के सुबह उठते ही सिर में असहनीय और बिजली के झटके जैसा तीव्र दर्द होना, जो मस्तिष्क की नस फटने या बड़े क्लॉट का संकेत हो सकता है।

‘गोल्डन ऑवर’ की चुनौती: जब नींद में आए स्ट्रोक, तो अस्पताल पहुंचने में न करें देरी

स्ट्रोक के इलाज में पहले साढ़े चार घंटे को ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है, क्योंकि इस समय सीमा के भीतर यदि मरीज अस्पताल पहुंच जाए, तो क्लॉट-बस्टिंग इंजेक्शन (tPA थ्रोम्बोलिसिस) देकर नसों में जमे थक्के को पूरी तरह घुलाया जा सकता है और मरीज पूर्णतः ठीक हो सकता है। वेक-अप स्ट्रोक के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि डॉक्टरों को यह सटीक समय नहीं पता होता कि स्ट्रोक रात को किस पहर आया था। आधुनिक न्यूरोलॉजी और आधुनिक एमआरआई इमेजिंग (DWI-FLAIR Mismatch) ने इस समस्या का काफी हद तक समाधान निकाल लिया है। अब उन्नत एमआरआई स्कैन के जरिए न्यूरोलॉजिस्ट यह सटीक आकलन कर लेते हैं कि दिमाग का कौन सा ऊतक अभी भी जीवित है और उसे बचाया जा सकता है। इसके अलावा, यदि क्लॉट बहुत बड़ा हो तो ‘मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टोमी’ नामक अत्याधुनिक कैथेटर प्रक्रिया के जरिए 24 घंटे के भीतर भी थक्के को सीधे दिमाग की नस से खींचकर बाहर निकाला जा सकता है। इसलिए, यदि सुबह उठते ही किसी में स्ट्रोक के लक्षण दिखें, तो यह सोचकर समय बर्बाद न करें कि थोड़ा आराम करने या चाय पीने से कमजोरी दूर हो जाएगी। मरीज को तुरंत ऐसे बड़े अस्पताल (Stroke-Ready Center) ले जाएं जहां 24 घंटे सीटी स्कैन, एमआरआई और न्यूरोलॉजिस्ट की सुविधा उपलब्ध हो।

किन लोगों को रहता है सबसे ज्यादा खतरा और रात को सोने से पहले क्या सावधानियां बरतें?

उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), अनियंत्रित डायबिटीज, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा और हृदय रोगों से पीड़ित लोगों में सोते समय स्ट्रोक आने का जोखिम सबसे अधिक रहता है। इसके साथ ही जो लोग अत्यधिक मानसिक तनाव में रहते हैं, देर रात तक भारी व तैलीय भोजन करते हैं, शराब का सेवन करते हैं या धूम्रपान के आदी हैं, उनकी रक्त वाहिकाएं अंदर से संकरी और सख्त हो जाती हैं। इस जानलेवा खतरे से बचाव के लिए जीवनशैली में कुछ बुनियादी बदलाव करना अनिवार्य है। सबसे पहले, अपने ब्लड प्रेशर और ब्लड शुगर की दवाओं को नियमित समय पर लें और डॉक्टर की सलाह के बिना रात की दवा कभी न छोड़ें। रात को सोने से लगभग आधा घंटा पहले एक गिलास गुनगुना पानी जरूर पिएं, ताकि रात भर शरीर में रक्त का प्रवाह सुचारू रहे और खून गाढ़ा न होने पाए। यदि आपको तेज खर्राटे लेने की आदत है या सुबह उठने पर सिर भारी रहता है और दिन भर थकान महसूस होती है, तो बिना देर किए स्लीप स्टडी (Polysomnography) कराएं और जरूरत पड़ने पर सीपैप (CPAP) मशीन का इस्तेमाल करें। देर रात अत्यधिक शराब के सेवन और सिगरेट से पूरी तरह दूरी बनाएं, क्योंकि यह रात के समय दिल की धड़कन और बीपी को अनियंत्रित कर देती है। सजगता, नियमित जांच और लक्षणों की समय पर पहचान ही रात के इस खामोश खतरे से आपकी जान और मस्तिष्क की सुरक्षा कर सकती है।

Check Also

जिम जाने वाले और फिट शरीर वाले लोग भी क्यों आ जाते हैं गंभीर डेंगू की चपेट में? जानिए ओवरएक्टिव इम्युनिटी का जानलेवा खेल

आमतौर पर यह माना जाता है कि कोई भी संक्रामक बीमारी केवल कमजोर इम्युनिटी वाले …