
शौच के दौरान मल में खून आना (Rectal Bleeding) एक ऐसा लक्षण है जिसे अधिकांश लोग संकोच या जानकारी के अभाव में बवासीर (Piles/Hemorrhoids) मानकर टाल देते हैं। मेडिकल साइंस और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट्स की मानें तो यह लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। हालांकि बवासीर और फिशर मलाशय से रक्तस्राव के आम कारण हैं, लेकिन हर बार खून आने की वजह यही हो, यह कतई जरूरी नहीं है। यह पेट, मलाशय और बड़ी आंत के गंभीर विकारों, विशेष रूप से कोलोरेक्टल कैंसर (Colorectal Cancer), इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) और आंतों के अल्सर का भी प्राथमिक संकेत हो सकता है। शुरुआती स्टेज में सही जांच न होने के कारण कई बार बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।
मल में खून का रंग और उसकी स्थिति अक्सर इस बात का संकेत देती है कि समस्या पाचन तंत्र के किस हिस्से में है। जब खून का रंग गहरा लाल या काला (Melena) होता है, तो इसका मतलब आमतौर पर आंतों के ऊपरी हिस्से या पेट से रक्तस्राव होना है, जबकि चमकदार लाल खून मलाशय या गुदा मार्ग के निचले हिस्से में समस्या का संकेत देता है।
कोलोरेक्टल कैंसर और पॉलीप्स का प्रारंभिक चेतावनी संकेत
कोलोरेक्टल कैंसर, यानी बड़ी आंत या मलाशय का कैंसर, विश्वभर में तेजी से बढ़ रहा है। इस बीमारी की शुरुआत अक्सर आंत की आंतरिक परत पर बनने वाले छोटे, गैर-कैंसरयुक्त उभारों यानी कोलन पॉलीप्स (Colon Polyps) से होती है। समय के साथ ये पॉलीप्स कैंसर का रूप ले सकते हैं और इनसे हल्का-हल्का रक्तस्राव होने लगता है, जो मल के साथ बाहर निकलता है।
यदि मल में खून आने के साथ-साथ आपके पेट साफ होने की आदतों में अचानक बदलाव आ रहा हो—जैसे लगातार कई हफ्तों तक कब्ज या दस्त बने रहना, पेट में ऐंठन, बिना किसी कारण के वजन कम होना या अत्यधिक थकान महसूस होना—तो इसे तुरंत गंभीरता से लेना चाहिए। कोलोनोस्कोपी (Colonoscopy) जांच के जरिए पॉलीप्स को शुरुआती अवस्था में ही पकड़कर कैंसर बनने से पहले हटाया जा सकता है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस और क्रोहन डिजीज (IBD) का खतरा
मल में खून आने का दूसरा बड़ा कारण इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) हो सकता है, जिसके दो मुख्य प्रकार हैं: अल्सरेटिव कोलाइटिस (Ulcerative Colitis) और क्रोहन डिजीज (Crohn’s Disease)। यह एक ऑटोइम्यून स्थिति है, जिसमें शरीर का अपना इम्यून सिस्टम बड़ी आंत की अंदरूनी परत पर हमला कर देता है, जिससे आंतों में छाले (Ulcers) और सूजन हो जाती है।
इस स्थिति में मरीज को बार-बार दस्त के साथ चिपचिपा बलगम (Mucus) और खून आने की समस्या होती है। साथ ही पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द और भूख में कमी देखी जाती है। सही समय पर उपचार न मिलने पर आंतों में रुकावट या छिद्र होने का खतरा बढ़ जाता है, जिसके लिए लंबे समय तक दवाओं और जीवनशैली में बदलाव की आवश्यकता होती है।
एनल फिशर और बवासीर में कैसे करें फर्क?
अधिकांश मामलों में गुदा मार्ग से खून आने की वजह एनल फिशर या बवासीर ही होती है, लेकिन इनके लक्षणों को पहचानना जरूरी है। बवासीर में गुदा की नसें सूज जाती हैं, जिससे मल त्याग के बाद बूंद-बूंद करके चमकदार लाल खून गिरता है और इसमें अक्सर दर्द कम होता है। वहीं एनल फिशर में कठोर मल के कारण गुदा की त्वचा में चीरा या कट लग जाता है, जिससे मल त्यागते समय कांच चुभने जैसा असहनीय दर्द और जलन होती है।
यदि किसी व्यक्ति को कब्ज की समस्या लंबे समय से है, तो उसे खानपान में तुरंत फाइबर की मात्रा बढ़ानी चाहिए और पर्याप्त पानी पीना चाहिए। लेकिन अगर घरेलू उपाय या ओवर-द-काउंटर क्रीम लगाने के बाद भी खून आना बंद न हो, तो बिना देर किए गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या कोलोरेक्टल सर्जन से जांच करानी चाहिए।
कब तुरंत अस्पताल जाना जरूरी है?
यदि रक्तस्राव अत्यधिक मात्रा में हो रहा हो, चक्कर आ रहे हों, बीपी अचानक कम हो रहा हो या मल का रंग पूरी तरह से तारकोल जैसा काला हो, तो यह आपातकालीन स्थिति हो सकती है। 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में मल के साथ खून आना कभी भी सामान्य नहीं माना जाना चाहिए। समय पर कराई गई एक सामान्य जांच जीवन की रक्षा कर सकती है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया