ट्रंप के आदेश के 96 घंटे के भीतर ईरान पर महाहमले को तैयार अमेरिकी सेना: बारूद के ढेर पर बैठा मिडिल ईस्ट

पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में दशकों का सबसे गंभीर सैन्य गतिरोध अब निर्णायक मुहाने पर पहुंच चुका है। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान (पेंटागन) और यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के उच्च स्तरीय सूत्रों के हवाले से सामने आई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेना के लड़ाकू विमान, नौसैनिक युद्धपोत और क्रूज मिसाइलें इस कदर हाई अलर्ट पर तैनात हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का औपचारिक आदेश मिलते ही ठीक 96 घंटे के भीतर ईरान के खिलाफ एक विध्वंसक और व्यापक सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। खाड़ी क्षेत्र में विमानवाहक पोतों (Aircraft Carriers), गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर्स और दर्जनों लड़ाकू स्क्वाड्रनों की स्थिति ऐसी बना दी गई है कि उन्हें ऑपरेशनल मोड में आने के लिए केवल 4 दिनों के समय की आवश्यकता है। सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल प्रतीकात्मक एयरस्ट्राइक नहीं, बल्कि ईरान के सैन्य ढांचे, कमांड सेंटरों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को पूरी तरह पंगु बना देने वाला त्रि-आयामी हमला हो सकता है। सवाल उठ रहा है कि जब तोपें और मिसाइलें तैनात हैं, तो वाशिंगटन की उंगली आखिर किस वजह से ट्रिगर दबाने से हिचकिचा रही है?

सब कुछ तैयार, फिर किस बात का इंतजार? समझिए व्हाइट हाउस का असली रणनीतिक पेंच

सैन्य तैयारी 100 प्रतिशत पूरी होने के बावजूद ट्रंप प्रशासन का इस अंतिम आदेश को रोके रखना एक सोची-समझी बहुआयामी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। सबसे बड़ा पेंच आगामी अमेरिकी मध्यावधि चुनावों और घरेलू राजनीति का है। वॉशिंगटन के रणनीतिकारों को भली-भांति पता है कि अगर चुनाव से ऐन पहले ईरान पर पूर्ण सैन्य हमला बोला जाता है, तो तेल की कीमतें रातों-रात 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं, जिससे अमेरिका और यूरोप में महंगाई का भीषण विस्फोट होगा। दूसरा बड़ा कारण कूटनीतिक ‘लास्ट चांस’ है। कतर, ओमान और क्षेत्रीय मध्यस्थों द्वारा तेहरान के सामने रखे गए शांति और युद्धविराम प्रस्तावों पर ईरान के औपचारिक जवाब का इंतजार किया जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ईरान को यह स्पष्ट संदेश देना चाहता है कि उसके पास टेबल पर आकर ‘बड़ी और सख्त डील’ करने का आखिरी विकल्प खुला है, लेकिन अगर उसने इसे ठुकराया, तो 96 घंटे की घड़ी तुरंत चालू हो जाएगी। तीसरा कारण खाड़ी के मित्र देशों जैसे सऊदी अरब और यूएई की सुरक्षा समीक्षा है, जो इस बात से आशंकित हैं कि अमेरिकी हमले के तुरंत बाद उनके तेल प्रतिष्ठानों और शहरों को ईरानी पलटवार का सामना करना पड़ सकता है।

ऑपरेशन के निशाने पर क्या होगा? नतांज, फोर्डो और आईआरजीसी के गुप्त ठिकाने

यदि राष्ट्रपति ट्रंप 96 घंटे के इस ऑपरेशन को मंजूरी देते हैं, तो अमेरिकी सेना का प्राथमिक लक्ष्य क्या होगा, इसका खाका भी काफी हद तक स्पष्ट है। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, इस संभावित अभियान का मुख्य उद्देश्य ईरान की परमाणु संवर्धन क्षमताओं को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद करना होगा। इसके तहत नतांज और पहाड़ों के भीतर गहराई में बने फोर्डो जैसे यूरेनियम संवर्धन संयंत्रों पर बंकर-बस्टर बमों (GBU-57 MOP) और स्टील्थ B-2 स्पिरिट बॉम्बर्स से सटीक हमले किए जा सकते हैं। इसके अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के मिसाइल लॉन्च पैड्स, ड्रोन निर्माण इकाइयां, वायु रक्षा प्रणालियां और तटीय रडार नेटवर्क्स को पहले चरण में ही नष्ट करने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है ताकि ईरान की पलटवार करने की क्षमता को न्यूनतम किया जा सके। अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों और नौसैनिक अड्डों को भी निशाना बना सकती है ताकि समुद्र में किसी भी ईरानी हलचल को तुरंत दबाया जा सके।

तेहरान का खौफनाक पलटवार प्लान: ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ और मिसाइलों की बारिश

दूसरी तरफ, ईरान भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है और उसने वाशिंगटन को किसी भी दुस्साहस के भयानक परिणामों से आगाह कर दिया है। तेहरान के शीर्ष सैन्य कमांडरों ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी हमले की स्थिति में यह युद्ध किसी एक देश तक सीमित नहीं रहेगा। ईरान की सबसे बड़ी जवाबी रणनीति ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को पूरी तरह बंद करने की है। यदि ईरान ने इस संकरे जलमार्ग में बारूदी सुरंगें बिछा दीं या एंटी-शिप मिसाइलों से मालवाहक जहाजों को निशाना बनाया, तो दुनिया के 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस का प्रवाह रुक जाएगा, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था ठप पड़ जाएगी। इसके साथ ही, ईरान के पास हजारों की संख्या में मध्यम और लंबी दूरी की बैलिस्टिक व हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, जिनका रुख बहरीन, कतर, कुवैत और इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों तथा इजरायल के प्रमुख शहरों की तरफ मुड़ सकता है। ईरानी ड्रोन नेटवर्क और प्रॉक्सी संगठन पूरे क्षेत्र में अमेरिकी दूतावासों और रसद आपूर्ति को निशाना बनाने के लिए तैयार बैठे हैं।

भारत, वैश्विक शेयर बाजार और कच्चे तेल पर मंडराता ब्लैकआउट का खतरा

अमेरिका और ईरान के बीच 96 घंटे के भीतर संभावित महासंग्राम की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और ऊर्जा बाजारों में हड़कंप मचा दिया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि युद्ध छिड़ता है और आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दामों में अप्रत्याशित उछाल आना तय है, जिसका सीधा असर देश की महंगाई दर, रुपए की कीमत और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ेगा। मुंबई के शेयर बाजार (BSE/NSE) में विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली तेज हो सकती है और एविएशन, पेंट्स, ऑटोमोबाइल तथा टायर कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। इसके अलावा, खाड़ी देशों में काम करने वाले करीब 90 लाख भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और आजीविका भी इस युद्ध की स्थिति में सीधे तौर पर दांव पर लग जाएगी।

क्या बातचीत से निकलेगा रास्ता या बारूद का धमाका तय है?

फिलहाल पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं और हर किसी की नजर व्हाइट हाउस और तेहरान के बयानों पर टिकी है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी तकनीकी और सामरिक तैयारियां 96 घंटे की समयसीमा के साथ लॉक कर रखी हैं। अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या ईरानी नेतृत्व अमेरिकी दबाव और प्रतिबंधों की शर्तों को मानते हुए बातचीत की मेज पर आता है, या फिर अपनी संप्रभुता और परमाणु कार्यक्रम पर अड़े रहने का फैसला करता है। यदि कूटनीति के पिछले दरवाजे से कोई ठोस सहमति नहीं बनती है, तो यह इंतजार बहुत लंबा नहीं खिंचेगा। 96 घंटे की यह मियाद किसी भी दिन शून्य पर पहुंच सकती है, और एक बार जब मिसाइलों की गूंज शुरू हुई, तो मिडिल ईस्ट एक ऐसे महाविनाशकारी युद्ध की आग में झुलस जाएगा जिसकी भरपाई करने में कई दशक बीत जाएंगे।

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