ट्रंप ने भारतीय प्रोफेशनल्स को दिया बड़ा झटका: H-1B वीजा की 1 लाख डॉलर भारी-भरकम फीस 1 साल के लिए बढ़ाई

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स, छात्रों और बड़ी टेक कंपनियों को एक और तगड़ा झटका दिया है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी आधिकारिक घोषणा के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने H-1B गैर-आप्रवासी वीजा याचिकाओं पर लगाई गई 100,000 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) की अतिरिक्त भारी-भरकम फीस की समयसीमा को पूरे एक साल के लिए आगे बढ़ा दिया है। यह नीति अब 21 सितंबर 2027 तक प्रभावी रहेगी। ट्रंप प्रशासन का यह आदेश उस वक्त आया है जब सितंबर 2025 में लागू किया गया मूल उद्घोषणा आदेश समाप्त होने वाला था। इस आदेश के विस्तार ने अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत से कुशल विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना बेहद खर्चीला और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

भारत पर सबसे गहरा असर: 71 फीसदी H-1B वीजा धारक भारतीय

ट्रंप के इस फैसले से दुनिया में सबसे ज्यादा प्रभावित भारतीय टेक समुदाय हो रहा है। अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, कुल स्वीकृत H-1B वीजा का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा केवल भारतीय प्रोफेशनल्स को मिलता है, जबकि दूसरे नंबर पर मौजूद चीन की हिस्सेदारी महज 12 फीसदी के आसपास है। पूर्व में H-1B वीजा आवेदन की लागत 2,000 डॉलर से 5,000 डॉलर के बीच हुआ करती थी। 1 लाख डॉलर यानी 88 लाख रुपये की यह विशाल फीस कई भारतीय कर्मचारियों के एक साल के पूरे वेतन से भी अधिक हो जाती है। इस भारी वित्तीय बोझ के चलते टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, कॉग्निजेंट जैसी बड़ी आईटी कंपनियों और अमेरिकी टेक दिग्गजों के लिए भारत से नए टैलेंट को अमेरिका बुलाना लगभग नामुमकिन जैसा हो गया है।

अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी और आईटी आउटसोर्सिंग पर ट्रंप का कड़ा प्रहार

व्हाइट हाउस ने अपने ताजा आदेश में तर्क दिया है कि अमेरिकी टेक कंपनियों ने पिछले वर्षों में 8 लाख से 13 लाख स्थानीय अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि विदेशी कर्मचारियों को सस्ते दामों पर रखने के लिए H-1B वीजा का दुरुपयोग किया गया। नए कार्यकारी आदेश के तहत संघीय एजेंसियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे किसी भी H-1B याचिका को मंजूरी देने से पहले कंपनी द्वारा हाल ही में की गई या भविष्य में प्रस्तावित अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की कड़ी जांच करें। प्रशासन के दावों के अनुसार, 1 लाख डॉलर की फीस और वेतन-आधारित लॉटरी सिस्टम लागू होने के बाद से बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों के H-1B पंजीकरण में 92 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है।

कोर्ट में फंसा है कानूनी पेंच, छात्रों और रिन्यूअल पर कुछ राहत

हालांकि, इस फीस का कानूनी दर्जा अभी भी अमेरिकी अदालतों में फंसा हुआ है। मैसाचुसेट्स की एक संघीय अदालत ने जून महीने में इस भारी-भरकम फीस को गैर-कानूनी करार देते हुए सरकार द्वारा इसकी वसूली पर रोक लगा दी थी। इस फैसले के खिलाफ ट्रंप प्रशासन ने बोस्टन स्थित अपीलीय अदालत में अपील दायर की है और मामला फिलहाल विचाराधीन है। राहत की बात यह है कि यह 1 लाख डॉलर की फीस उन मौजूदा कर्मचारियों पर लागू नहीं होती जो अपने वीजा का नवीनीकरण (रिन्यूअल) करा रहे हैं, और न ही यह उन विदेशी छात्रों पर लागू है जो पहले से अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं और छात्र वीजा (F-1) से H-1B में ट्रांसफर हो रहे हैं। इसके बावजूद, भारत से सीधे अमेरिकी नौकरी का सपना देखने वाले हजारों युवाओं के लिए यह विस्तार एक बहुत बड़ा झटका साबित हुआ है।

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